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हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब

Gulzar DehlaviGulzar Dehlavi
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हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब

इक कसक सी रह गई दल के क़रीब

सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब

बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब

ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी

अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब

इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए

भूल कर देखा न महमिल के क़रीब

हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ

जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब

ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना

आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब

ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब

भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब

तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए

बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब

होश की कहता है दीवाना सदा

और मायूसी है आक़िल के क़रीब

देखिए उन बद-नसीबों का मआल

वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब

छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ

फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब

 

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