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मेरा तो लघु तारा

Gulab KhandelwalGulab Khandelwal
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मेरा तो लघु तारा
कुल आकाश तुम्हारा

मेरी वीणा,
गूँज नहीं पायी जिसकी ध्वनि क्षीणा
दीना, हीना
और तुम्हारी स्वर-माधुरी नवीना,
नया सलिल, नव धारा,

प्रेम किसी का
अथवा कोई सपना फीका-फीका
मेरे जी का,
शीश तुम्हारे विश्व-विजय का टीका
सुन्दर, सहज, सँवारा,

संध्या-वेला,
लहरों-सा सुख-दुख मैंने सब झेला
सबसे खेला
देख चुका अपनों की भी अवहेला,
छलता रहा किनारा

मेरा तो लघु तारा
कुल आकाश तुम्हारा

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