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मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ

Gopal Singh NepaliGopal Singh Nepali
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मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ
नील गगन में पंख पसारूँ;
दुःख है, तुमसे बिछड़ गया हूँ
किन्तु तुम्हारी सुधि न बिसारूँ!

उलझन में दुःख में वियोग में
अब तुम याद बहुत आती हो;
घनी घटा में तुमको खोजूँ
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ;

जब से बिछुड़े हैं हम दोनों
मति-गति मेरी बदल गई है;
पावस में हिम में बसंत में
हँसते-रोते तुम्हें पुकारूँ!

तब तक मन मंदिर में मेरे
होती रहे तुम्हारी पग-ध्वनि;
तब तक उत्साहित हूँ, बाजी
इस जीवन की कभी न हारूँ!

तुम हो दूर दूर हूँ मैं भी
जीने की यह रीती निकालें,
तुम प्रेमी हो-प्रेम पसारो
मैं प्रेमी हूँ-जीवन वारूँ!!

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