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दफ़्तर में एक दिन | कहानी

Fahmida RiazFahmida Riaz
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फ़िदवी की गुज़ारिश है कि बवजूह रमज़ान-उल-मुबारक अज़ बतारीख़ रमज़ान बमुताबिक़ 12 फरवरी ता 27 रमज़ान-उल-मुबारक क़मरी हिज्री बमुताबिक़ तारीख़ फ़ुलां ईसवी फ़िदवी को रुख़स्त मकसूबा फ़रमा दी जाये।

अहक़र उल-ईबाद

फ़ुलां

इस मज़मून का एक नामा औरत की मेज़ पर पड़ा था। उसने हस्ब-ए-आदत पहले तो उसमें जो कुछ लिखा था , उसको एक नज़र में समझने की कोशिश की लेकिन सच्च यही है कि उसे दुबारा पढ़ना पड़ा।

"ये रुख़स्ते मकसूबा क्या है?" उसने पूछा।

"जी Earned Leave ", मुलाज़िम लुग़त बोर्ड ने इन्किसार से कहा।

"ये छुट्टी की दरख़्वास्त है कि निकाहनामा?" औरत ने काग़ज़ पर "मंज़ूर" लिख कर दस्तख़त जमाते हुए कहा। "बस महरे मुअज्जल की कसर है।" फिर हंसकर इज़ाफ़ा किया, "एक लम्हे को तो मैं ये भी समझी थी कि गवर्नर सिंध जनाब इशरत उल ईबाद ने किसी शादी का दा’वतनामा भेजा है।" फिर उसने हसरत से पूछा, "यहां इसी ज़बान में ख़त लिखे जाते हैं?"

"जी ! मुद्दत से", जवाब मिला। फिर मुस्कुराते हुए, "दरअसल हम दफ़तर में अंग्रेज़ी का इस्ति’माल पसंद नहीं करते। जैसा कि आप वाक़िफ़ ही होंगी , ये इदारा पाकिस्तान में नफ़ाज़े उर्दू के लिए क़ायम किया गया था। और गो सर सय्यद रहमत अल्लाह अलैहि-ओ-हाली मद्दज़िल्लुहू की ये आरज़ू पाय-ए-तकमील तक न पहुंची लेकिन अब...(मा’नी-ख़ेज़ वक़्फ़े के बाद) आपके यहां तक़र्रुर के बाद तो उम्मीद अज़ सर-ए-नौ बेदार हो गई है।"

हाली और सर सय्यद से फ़ौरी तौर पर मंसूब इस आरज़ू पर कि पाकिस्तान में उर्दू नाफ़िज़ कर दी जाये, औरत ने बमुश्किल हंसी ज़ब्त करते हुए और आख़िरी फ़र्माइशी ख़ुशामदाना जुमले के जवाब में दरख़्वास्त पर मंज़ूर के साथ "बखु़शी" का इज़ाफ़ा कर के बुदबुदाते हुए कहा।

"इस उम्मीद को आप मह्वेख़्वाब ही रहने दें तो बेहतर रहेगा।"

"क्या फ़रमाया?"

"कुछ नहीं।"

"फिर भी..."

"मैं कह रही थी कि माशा अल्लाह आपकी उर्दू कितनी अच्छी है।"

वो कानों तक मुस्कुराए और मेज़ पर से काग़ज़ उठाते हुए बोले, "अजी साहिब मैं क्या और

मेरी बिसात क्या?" फिर उन्होंने ऊपर देखकर छत में लगे हुए पंखे की तरफ़ अनगुश्त-ए-शहादत से इशारा

कर के कहा, "ये सब तुम्हारा करम है आक़ा कि बात अब तक बनी हुई है।"

इतना कह कर वो ग़ायब ग़ला हुए। पंखा बहरहाल फ़ौरन बंद हो गया , क्योंकि बिजली चली गई थी। एक नायब क़ासिद कमरे में दाख़िल हुआ। उसने तमाम खिड़कियाँ खोल दीं। गर्म हवा के तेज़ झोंकों ने मेज़ पर रखे काग़ज़ तितर बितर कर दिए। औरत ने दोनों हाथ बांध कर गोद में रखे, टूटी हुई सदारती कुर्सी पर एहतियात से टेक लगाई और फिर ख़यालों में उदासी से ग़र्क़ हो गई और खिड़की से दर आती रोशनी की चौड़ी पट्टी में नाचते गर्द-ओ-ग़ुबार के ज़र्रों पर नज़रें जमा दीं।

"नफ़ाज़े उर्दू!" वो सोच रही थी। "बर वज़न नफ़ाज़े मार्शल ला या नफ़ाज़े ख़त्म नबुव्वत"। उस पर फिर हंसी का दौरा पड़ा। गुज़िशता हफ़्ते वो लाहौर में एक क़दीम मस्जिद , मस्जिद वज़ीर ख़ान देखकर आई थी जिसके शिकस्ता हाल Entrance पर जिसके बा रो’ब नीले और ज़मुर्रदें नक़्श-ओ-निगार बताते थे कि कभी वो कितनी जमील-ओ-जलील रही होगी, बड़ा सा बैनर देखा था। "इजतिमा बराए नफ़ाज़े ख़त्म नबुव्वत"।बिलकुल यूं मालूम हो रहा था कि शहर के कोनों खद्दरों से ला तादाद नबुव्वत के दाई निकल पड़े हैं। एक वबा सी फैल गई है जिसका फ़ौरी इंसिदाद बेहद ज़रूरी है।

"ये सब क़ादियानियों की मुंडिया रगड़ने के लिए..." तब उसने अफ़सोस से सोचा था। और बेचारे क़ा दियानी क्या कहते हैं...ऐसा सुनने की किसी को फ़ुर्सत नहीं। कभी स्कूल के ज़माने में एक क़ादियानी लड़की उस की हमजमाअ’त थी। वो ख़ुश-बख़्त इस क़दर रोज़ा नमाज़ की पाबंद थी कि उससे कभी दोस्ती नहीं हो सकी थी। वो रोज़ा नमाज़ सब बेकार। अफ़सोस!

बहरहाल उसे नफ़ाज़े उर्दू का ज़र्रा बराबर शौक़ न था। इस मौज़ू पर वो अक्सर ख़ामोश ही रहती थी या कभी कह भी देती थी, "अंग्रेज़ी में क्या हर्ज है? क्यों भड़ों के छत्ते में हाथ डालते हैं? पाकिस्तान की अपनी ज़बानें भी हैं। और वैसे ता’लीम के लिए आ’ला दर्जे की किताबें न उर्दू न सिंधी, न पंजाबी, पुश्तो, सरायकी या बलोची में हैं। एक मेडीकल ही को लीजीए। अंग्रेज़ी के सिवा कौन सी ज़बान में एम.बी.बी. एस. ही के दर्जे की किताबें पढ़ाएँगे हम? इस से आगे स्पेशलाइजेशन की तो दूर की बात है। इल्म अच्छा और ज़रूरी है हमारे बच्चों के लिए, ख़्वाह किसी भी ज़बान में मिले। ख़्वाह-मख़ाह की बग़ैर सोचे समझे नारेबाज़ी। ख़ुशामद और हद दर्जा मुबालग़ा। ये सब भी उर्दू का हिस्सा समझा गया है यहां, जब कि ये सच्च न था। उर्दू में तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे और इस्मत चुग़ताई... राशिद और मीराजी... मंटो... इस ज़बान का अदब बाग़ीयों से भरा पड़ा था। कम अज़ कम औरत तो उसी को उर्दू जानती थी। उर्दू में "इन्क़िलाब ज़िंदाबाद" बर्र-ए-सग़ीर की बेशतर ज़बानों में रच बस गया था या शायद ख़ुशामद सिर्फ उर्दू का हिस्सा नहीं, क़ौमी मिज़ाज बन चुका हो। उसे याद आया था, इस्लामाबाद में फ़नानशल एडवाइज़र से मिलने उसके साथ सिंध मुदर्रिसा की प्रिंसिपल भी गई थीं। दोनों की दरख़्वास्त एक ही थी कि इदारों के वजूद को तस्लीम कराया जाये जो 1986 से मर्कज़ी खातों से ग़ायब हैं। सिंध मुदर्रिसा की प्रिंसिपल लियारी की एक मुहज़्ज़ब और ता’लीम याफ़ता ख़ातून थीं जिन्होंने ज़िंदगी के पच्चीस तीस बरस इसी मदरसे में तदरीस करते हुए बिताए थे लेकिन फ़नानशल एडवाइज़र से वो किस तरह बात कर

रही थीं! जब उन्होंने कहा, "जनाब हम आपके बाल बच्चों को दुआएं देंगे। अल्लाह साईं आपका इक़बाल हमेशा बुलंद रखे।" तो औरत ग़म-ओ-ग़ुस्से से मबहूत हो कर रह गई थी। अपने इदारे के लिए उस के मुँह से एक लफ़्ज़ भी नहीं निकल सका था। अफ़सोस और शर्मिंदगी की ताक़तवर रौ ने उसके दिल को जकड़ लिया था। बार-बार एक ही ख़्याल ज़हन में गर्दिश कर रहा था, "भिकारी बना कर रख दिया इनको।"

"भिकारी!" किया फ़नानशल मुशीर को ये सुनकर शर्मिंदगी हो रही थी? ऐसा उनके चेहरे से ज़ाहिर न था। शायद उन्हें ये सब सुनने की आदत पड़ चुकी थी।

औरत ने कुर्सी पर पहलू बदला तो कुर्सी टेढ़ी हो कर गिरने लगी। औरत ने सँभल कर कुर्सी का तवाज़ुन ठीक किया। ये टूटी हुई थी, इसे बदल दिया जाना चाहिए था या इसकी मरम्मत की जानी चाहिए थी। लेकिन एक तो औरत को इसकी फ़ुर्सत नहीं मिल सकी थी और दोयम ये कि मरम्मत और फ़र्नीचर की मद में जो रक़म थी, उसे दूसरी मदों में मुंतक़िल करने की दरख़्वास्त दे दी गई थी ताकि इदारा बिजली और टेलीफ़ोन का बिल अदा करसके।

रि एप्रोप्रेअशन यानी मुंतकली रक़ूम की फाइल महीने भर पहले फिनांस के डिप्टी एडवाइज़र को भेजी जा चुकी थी लेकिन हनूज़ जवाब नहीं आया था। दफ़्तर के स्टाफ़ ने उससे कहा था कि ये तो रूटीन का मुआ’मला है। गुज़िशता बरस इस में दो एक दिन से ज़्यादा नहीं लगे थे। पिछली बार जब वो इस्लामाबाद गई थीं तो सेक्शन अफ़सर के कहने पर वो डी एफ़ ए से मिलने भी गई थी।

"उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है। रक़ूम की तमाम फाइलें उनके दस्तख़तों ही से चलती हैं।"

"लेकिन इधर आप मुझसे कहते रहते हैं कि मैं अपने से एक नंबर भी निचली ग्रेड के ऑफिसर को ख़त तक ना लिखूँ। दफ़्तर के किसी दूसरे अफ़सर से लिखवाऊँ वर्ना मैं वज़ारत के प्रोटोकोल ख़राब कर रही हूँ। अब आप कहते हैं कि उनसे मिलूँ।"

"लेकिन इधर आप मुझसे कहते रहते हैं कि मैं अपने से एक नंबर भी निचली ग्रेड के ऑफिसर को ख़त तक ना लिखूँ। दफ़्तर के किसी दूसरे अफ़सर से लिखवाऊँ वर्ना मैं वज़ारत के प्रोटोकोल ख़राब कर रही हूँ। अब आप कहते हैं कि उनसे मिलूँ।"

"जन आब..." औरत ने घबराहट में ख़ुद को "जनाब-ए-वाला" कहने से बाज़ रखा , मबादा वो

इस नाज़ुक प्रोटोकॉल का नास ही ना पीट दे जिसके बग़ैर ये दफ़्तरी निज़ाम नहीं चल सकता, हालांकि

सूरत-ए-हाल बिलकुल ऐसी ही थी कि डी एफ़ ए के दर पर वो किसी साइल की शक्ल में ही पहुंची थी।

"मिस्टर फ़ुलां", उसने फिर भी मुम्किना हद तक मतानत मुजतमा करके कहा, "हमारी फाइलें..."

"हूँ हूँ!" डी एफ़ ने उसकी बात काटी। "बड़ा अर्जेंट मैटर है इस वक़्त मेरे सामने। वज़ीर-ए-आज़म की मुआ’विन ख़ुसूसी का टेलीफ़ोन आया है। परसों उन्होंने कान्फ़्रैंस के लिए लाहौर जाना है तो सारा इंतिज़ाम तो मुझी को करना हुआ नाँ।"

फिर वो पै दर पै मुतअद्दिद फ़ोन करने लगा जिनमें वो मुख़्तलिफ़ शो’बों को कुछ और शो’बों से राबिता कर के मा’लूमात हासिल करने और फिर उसे इत्तिला देने की हिदायात दे रहा था।

इसके बाद वो किसी दूसरी फाइल की वर्क़ गरदानी करने लगा।

अब तक इस दफ़्तर में आए औरत को तक़रीबन एक घंटा हो चुका था, उसने कहा,

"मैं काफ़ी देर से यहां बैठी हूँ और कुछ कहना चाहती हूँ। मैं अब चली जाऊँगी।"

अफ़सर हज़ा ने पूरे इतमीनान से फाइल से सर उठा कर कहा,

"मुहतरमा! आप जब चाहें यहां तशरीफ़ ला सकती हैं, यू आर मोस्ट वेल्कम।"

"हमारी फाइलें..." औरत ने कहना शुरू किया।

"एक नई अफ़सर आई हैं। सुना है बड़ी सख़्त हैं। आप उनसे भी मिल लीजीए।"

अब औरत के सब्र का पैमाना बिलआख़िर लबरेज़ हो ही गया, उसने कहा, "मैं यहां मुख़्तलिफ़ कमरों में

भटकने के लिए नहीं आई हूँ। आपने मुझे फ़ाइलों के बारे में एक बात भी नहीं की है जो मैं कोई वज़ाहत कर सकती।"

डी एफ़ ए ने घड़ी देखी और खड़ा हो गया।

"अब मुझे एक मीटिंग में जाना है।" उसने कहा और उसे कुर्सी पर बैठा छोड़कर अपने दफ़्तर से बाहर जाने लगा। औरत हवन्नक़ों की तरह उठ खड़ी हुई। वो सोच रही थी कि उसे मिठाई का डिब्बा लेकर आना चाहिए था। लेकिन वो समझ नहीं पाई थी कि मिठाई का मतलब वाक़ई मिठाई ही था या कुछ और...

"वज़ारात-ए-ता’लीम के लोग ख़ुद तो कुछ काम करते नहीं," डी एफ़ ने जाते-जाते कहा "अधूरी फाइलें भेजते हैं, चाहते हैं कि उनका काम भी हम करें। कुछ आता- जाता तो उन्हें है नहीं।" इतना कह कर वो चला गया।

रास्ता ढूंढती औरत उस इमारत से बाहर निकली थी। इस सारी कद-ओ-काविश का नतीजा यही निकला था कि रक़ूम की मुंतकली की फाइल हनूज़ डी एफ़ ए के क़ब्ज़ा-ए-क़ुदरत में थी । रक़म इदारे के पास मौजूद थी लेकिन सही मद में न होने के बाइस निकाली नहीं जा सकती थी।

"मैं डी एफ़ ए को ख़ुश नहीं करसकी।" औरत ने पछतावे से सोचा। "मेरी वजह से इदारे को नुक़्सान पहुंच रहा है। बिल अदा न करने के बाइस टेलीफ़ोन कट चुका है। गाड़ी के लिए पेट्रोल की बूँद नहीं...बिजली भी कट सकती है। ये सब...मेरा क़सूर है।" औरत जानती थी कि गो उसने कहा कुछ भी ना हो लेकिन डी एफ़ ए के दफ़्तर में उसके चेहरे पर लिखा होगा, "मुझे परेशान ना कीजीए। अपना फ़र्ज़ वक़्त पर अंजाम दीजीए।" ये बात डी एफ़ ए को कैसे पसंद आसकती थी।

दफ़्तर के कुछ लोग उसके पास पहुंचे।

"मैडम, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। कहीं यूं तो नहीं कि..."

"क्या?" उसने आँखें फैला कर पूछा।

"कि साज़िश उसी दफ़्तर से शुरू हुई हो।"

औरत ग़ौर से सुनने लगी।

"आपसे पहले जो साहिबा क़ाइम मक़ाम थीं, वो अक्सर इस्लामाबाद फ़ोन करती रहती हैं।"

"हूँ।" औरत ने कहा। उस की तक़र्रुरी से ज़ाहिर है कि क़ाइम मक़ाम को नुक़्सान पहुंचा था। अगर वो कुछ ना करती तो ताज्जुब की बात थी । जो बात उस से कही जा रही थी, वो नामुमकिन नहीं थी।

"क्या ये इतने असर-ओ-रसूख़ रखती है?" औरत ने कहा।

"ख़ैर असर-ओ-रसूख़ तो कोई क्या रखेगा इस्लामाबाद में..." एक ने कहा, "लेकिन एक रिश्ता तो उनमें और डी एफ़ ए में है ना...वही...भई दोनों अहल-ए-तशीअ हैं।"

औरत के दिमाग़ में घंटी सी बजी। उसकी आँखें और भी फट गईं।

"ये लोग एक दूसरे से हमदर्दी रखते हैं, मदद करते हैं एक दूसरे की।" दूसरे ने ख़ामोशी से कहा।

औरत सन सी बैठी रही। क्या ये मुम्किन था?

उसका पहला ख़्याल यही था कि ये नामुमकिन नहीं था।

"फिर क्या किया जा सकता है?" उसने बिलआख़िर कहा।

उसके ज़हन में आया ,वो शिकायती ख़त जो वो इस नाज़ेबा ताख़ीर पर लिखने वाली थी, इस में एक पैराग्राफ़ का इज़ाफ़ा।

"दीगर ये कि यहां की पुरानी क़ाइम मक़ाम ख़ातून ने डी एफ़ ए के साथ मिलकर साज़िश की है, उनके कहने पर डी एफ़ ए मेरे तक़र्रुर को नाकाम बनाना चाहते हैं । वो साबिक़ क़ाइम मक़ाम की मदद करना चाहते हैं। क्योंकि दोनों शीया हैं। इस तरह अहल-ए-तशीअ ने हम सुन्नीयों के ख़िलाफ़ महाज़ बना लिया है।

दुहाई है दुहाई...या अहले सुन्नत! आईए मदद को आईए। एक सुन्नी औरत मुसीबत में मुबतलाहै।"

ये सोचते सोचते औरत दाएं हाथ की चार उंगलियों को बे-ख़याली में अपने मुँह में ठूँस चुकी थी और उन्हें चबा रही थी। उसकी चश्म-ए-तसव्वुर ने देखा कि उसकी पुकार सुनकर समुंद्रों पर जहाज़ों ने बादबान खोल दिए हैं और एक फ़ौज उसकी मदद को रवाना हो गई है। जहाज़ों से ग़लग़ला बुलंद हो रहा है। "लब्बैक , लब्बैक, अल्लाहुम्म लब्बैक... हम पहुंचे कि पहुंचे...ए उम्मत की दुख़्तरे नेक अख़्तर!"

बिजली फिर चली गई। उसके हमदर्द रुख़्सत हुए। नायब क़ासिद ने फिर दरवाज़े और खिड़कियाँ खोल दीं। खुले दरवाज़े से एक और हमदर्द कारकुन अंदर आया और मेज़ के पास खड़ा हो गया।

"जी?" औरत ने मुँह से उंगलियां निकाल कर पूछा।

"तो डिक्शनरी बिलआख़िर ख़त्म हो गई है।" हमदर्द ने परेशान हाली से कहा।

"हाँ। ये तो इतनी ख़ुशी की बात है। पाँच छः अशरों की मेहनत सुवारथ हुई।"

"तो इसकी इत्तिला अख़बारों में भेजें?"

"क्यों नहीं!" औरत ने कहा, "गुड आइडिया। आप प्रेस रीलीज़ बनाइऐ।"

"वो तो मैं बना कर ही लाया हूँ।" कारकुन ने कहा, "बस आप दस्तख़त कर दें, लेकिन किसी को कानों-

कान ख़बर ना हो। कल के अख़बारों में धमाका हो जाएगा। सब देखते के देखते रह जाऐंगे। आप इन सबको रौंद कर फेंक दीजीए।"

औरत ने कुछ मुस्कुराना शुरू किया। "किन को रौंद कर फेंक दूं?" उसने दिलचस्पी लेते हुए पूछा।

"अपने सब मुख़ालिफ़ीन को।" कारकुन ने कुछ चकरा कर कहा।

"वो कौन हैं?" औरत ने पूछा।

हमदर्द कारकुन काफ़ी मायूस हुआ। फिर भी उसने कहा, "यहीं...इसी दफ़्तर में...और बाहर भी। लोग बेहद जल रहे हैं। उनके सीने पर साँप लोट रहे हैं।"

"हूँ!" औरत ने ख़ुद को कुछ महफ़ूज़ होता हुआ पाया। बे-ख़याली में वो मेज़ से अपना हैंड बैग उठा कर कमरे से निकली और सीढ़ीयां उतरती चली गई। वो साँप लोटने पर ग़ौर कर रही थी। क्या साँप लोटने से भी कुछ नुक़्सान होता है? ज़हर तो साँप के फन में होता है। जब साँप डस ले , नुक़्सान दर्द या जलन तो तब ही होती है। उसने ख़ुद एक मिसरे में कभी बाँधा था।

"एक स्याह साँप सा, दिल पे तमाम शब फिरा."

फिर ये साँप वाला मुहावरा कैसे बना? साँप लोट रहा है, साँप फिर रहा है, दिल पर साँप सा फिरना। शायद ये मुहावरा नहीं, महज़ एक मुहावरे की शायराना तरमीम है। मगर साँप लोटने से जो डर, जो घबराहट पैदा हो सकती है कि अब ये डस लेगा, ग़ालिबन मुहावरे का जवाज़ ये ख़ौफ़ ही हो लेकिन ये वज़ाहत उसे कुछ जची नहीं। उसने सोचा कि मुहावरे की वज़ाहत ग़ालिबन कुछ भी नहीं है, लेकिन ये निहायत पुर तासीर मुहावरा है और बस इसीलिए वजूद में आया और बाक़ी है।

दफ़्तर की कार उसे घर की तरफ़ ले जा रही थी। उसने हैंड बैग के अंदर झाँका। हमेशा की तरह वो कई चीज़ें दफ़्तर की मेज़ पर ही भूल आई थी। उस का सेल फ़ोन, टेलीफ़ोन डायरेक्टरी , चशमा...

एक लंबी सांस खींच कर उसने सोचा , "ख़ैर , कल सुबह ये सब कुछ वहीं रखा मिल जाएगा।" फिर अपनी दूर अंदेशी की दाद दी कि घर पर उसने एक और चशमा रख छोड़ा है।

गाड़ी में बैठे-बैठे औरत को ख़्याल आया कि शीया गर्दी, सुन्नी गर्दी, मुहाजिर गर्दी, सिंधी गर्दी और जाने कितनी ही गर्दियों के अज्ज़ा-ए-तर्कीबी को उसने ग़ालिबन थोड़ा बहुत समझना शुरू किया है। उसे उनकी हैरतख़ेज़ ताक़त और तरग़ीब पर शर्मिंदगी भरा ताज्जुब हुआ। उसे साँवले डी एफ़ का ख़्याल आया जो ग़ालिबन इस इदारे की फ़ाइलों पर बक़ौल मुहावरा-ए-वज़ारत "अंग्रेज़ी लिख लिख कर" वज़ारात-ए-ता’लीम के आफ़िसरान के बादशाहों पर इक्के मार रहा है, उनकी ऐसी की तैसी कर रहा है, उन्हें रौंद कर फेंक रहा और शायद सोच भी नहीं सकता कि इस तफ़रीह से दूर कहीं कराची में एक अधूरा

सद्धूरा इदारा कितनी मुसीबत में मुबतला हो गया है। या शायद ऐसा ना हो, वो सच-मुच सिर्फ़ औरत को ही दिक़ कर रहा हो क्यों न औरत ने उसकी अना की तसकीन की और न ही मिठाई पेश की।

हक़ीक़त क्या थी? औरत का दिल चाहा कि फुटपाथ फिर बैठे आ’मिल मुनज्जिम के तोते से कार्ड मुंतख़ब करा के मालूम कर ले। इस वक़्त सच्च तो ये था कि वो इस इदारे से कहीं बहुत दूर चली

जाना चाहती थी। दूर...बहुत दूर मगर उसे एक मौहूम सा शुबहा था कि कोई भी जगह इदारे या वज़ारत से बहुत दूर नहीं है।

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