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ऐ इश्क़ तू ने वाक़िफ़-ए-मंज़िल बना दिया

Dil ShahjahanpuriDil Shahjahanpuri
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ऐ इश्क़ तू ने वाक़िफ़-ए-मंज़िल बना दिया

अब मरहलों को और भी मुश्किल बना दिया

अल्लाह-रे शौक़-ए-क़ैस की जल्वा-तराज़ियाँ

अक्सर ग़ुबार-ए-दश्त को महमिल बना दिया

मैं ग़र्क़ हो रहा था कि तूफ़ान-ए-इश्क़ ने

इक मौज-ए-बे-क़रार को साहिल बना दिया

हम ने इक आह-ए-सर्द को शम-ए-सहर के साथ

रूदाद-ए-ना-तमाम का हासिल बना दिया

ऐ दिल ये सब अमीर-ए-सुख़न-वर का फ़ैज़ है

ज़र्रे को जिस ने जौहर-ए-क़ाबिल बना दिया

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