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जब ज़रा रात हुई और मह ओ अंजुम आए

Asad BhopaliAsad Bhopali
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जब ज़रा रात हुई और मह ओ अंजुम आए

बार-हा दिल ने ये महसूस किया तुम आए

ऐसे इक़रार में इंकार के सौ पहलू हैं

वो तो कहिए कि लबों पे न तबस्सुम आए

न वो आवाज़ में रस है न वो लहजे में खनक

कैसे कलियों को तिरा तर्ज़-ए-तकल्लुम आए

बार-हा ये भी हुआ अंजुमन-ए-नाज़ से हम

सूरत-ए-मौज उठे मिस्ल-ए-तलातुम आए

ऐ मिरे वादा-शिकन एक न आने से तिरे

दिल को बहकाने कई तल्ख़ तवहहुम आए

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