जिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुए's image
2 min read

जिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुए

Anuj LugunAnuj Lugun
0 Bookmarks 320 Reads0 Likes

जिन्हें पेड़ होना था वे आतताई हुए
जिन्हें छाँव होना था वे बंजर हुए
और जो दलित हुए
उन्हें गुठलियों की तरह रोपा जाता रहा संसदीय खेत में

मजदूरी अब विषय नहीं जाति का उत्सव है
अब हत्याओं की होड़ कारीगरी है
मरे हुए तालाब में लाशें नहीं
विचारधाराएँ तैर रही हैं
जिन्हें विमर्श रुचिकर नहीं लगा
प्रति विमर्श को उन्होंने खंजर की जगह दी
यह साहित्य में है, यह चिन्तन में है
यह राजनीति में है, यही सहारनपुर है

जिनकी सन्तानों को पेड़ होना था
जिनकी सन्तानों को हरा होना था
वे समाजशास्त्र के विषय में फेल हुए
और वे उठा लाए अपने पुरखों की हिंसक क़ब्रें
झूठी शान और स्वाभिमान का जातीय दम्भ
इतना क्रूर और इतना ज़हरकारी कि बौद्धिक तक उससे मुक्त नहीं
ख़ून वहीं से रिस रहा है
गोली वहीं से चल रही है

सबको होना तो पेड़ ही था
हरे होते, फूल होते, साँसे होती
लेकिन छूटता कैसे उनका अहंकार
और भूलते कैसे हम यातनाएँ
कब तक भंगी कहलाते
कब तक आदमी न कहलाते
होना था ही इतिहास में, जो हुआ सहारनपुर में
क्या कुछ नहीं हुआ हाल ही में गढ़चिरौली में?

मुक्त नहीं हैं हम विभाजन से
तटस्थ नहीं हैं हम सवालों से
हम पहचाने जाएँगे आख़िर
गोली चलेगी जब
तब किधर होगा हमारा सीना
यहाँ वर्ग है, विमर्श नहीं
यहाँ वर्ण है, बहस नहीं
'यह गोली दागो पोस्टर है' विज्ञापन नहीं

शुक्र होगा सब यह जान जाएँ
कौन बकरी चरावे जेठ में
कौन कलेजा सेंके ग़ुलामी में
कौन लिखे लाल इतिहास
साँवले चेहरों के नीले कन्धों पर.?

यह विमर्श है यातनाओं का
जिन्हें न रुचे वह लौटें अपने जातीय खोल में
और हमें ललकारें
यह युग हमारा है,यह इतिहास हमारा है
चलेंगे साथ वे जो मानुख होंगे, खरे होंगे।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts