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जलते बुझते लोग

Amrita PritamAmrita Pritam
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दो शब्द

उठती जवानी की रंग़ों में जाने क्या-क्या सुलगने लगता है, और जाने खुदा, एक तकदीर ज़ेहन में किस तरह खेलने लगती है-इसी का अनुमान कुछ उत्तर पाया है-इन तीनों लघु उपन्यासों में- जलावतन-तन के थोड़े-से बरसों में, मन की अन्तर-सतह में उतर जाने की वह कहानी है, जो जलते बुझते अक्षरों में लिपटी हुई है-

जेबकतरे-यह एक उदास नस्ल की वह कहानी है जिसमें किरदारों के पैर जिन्दा हैं, पर पैरों के लिए रास्ते मर गए हैं- कच्ची सड़क-उठती जवानी में किस तरह एक कम्पन किसी के अहसास में उतर जाता है कि पैरों तले से विश्वास की ज़मीन खो जाती है-यही बहक गए बरसों के धागे इस कहानी में लिपटते भी हैं, मन-बदन को सालते भी हैं, और हाथ की पकड़ में आते भी हैं-

ये तीनों लघु उपन्यास उन किरदारों को लिए हुए हैं, जो उठती जवानी में चिन्तन की यात्रा पर चल दिए हैं और इन तीनों का इकट्ठा प्रकाशन-समय काल का एक अध्ययन होगा। -अमृता प्रीतम

 

पहला पहर

सुबह का पहला पहर रोज मेरे हाथ में एक कुदाल-सी पकड़ा देता है, और मैं इस कुदाल से अपने-आपकी खुदाई करने लग जाता हूं... इस वक्त भी मेरे हाथ मिट्टी से सने हुए हैं, रोज सन जाते हैं...

सने हुए हाथों से लोग इस धरती में से बीती हुई सभ्यता के निशान खोजते हैं, पत्थरों के बर्तन चाँदी के सिक्के, मिट्टी की मूर्तियां...और या आने वाली सभ्यता के यानी सोने की खानें या तेल के सोते...। पर मैं अपने-आपकी खुदाई में से सिर्फ अपना वर्तमान ढूंढ़ रहा हूं-जो बाहर होता हुआ भी बाहर नहीं है। सोचता हूं शायद यह मेरे अन्दर होगा... पिछले साल तक सब कुछ बाहर लगता था-मुझे भी, पापा को भी। जब एम.एस-सी. करने लगा था, पापा ने अपना भविष्य भी मेरे साथ जोड़कर बहुत कुछ सोचना शुरू कर दिया था... उनका सोचना अब भी जारी है...सिर्फ मेरा रुक गया है...

शायद वर्तमान एक खाई बन गया है, मैं किसी ख्याल को परे तक ले जाने भी लगता हूं तो यह इधर इस खाई में गिर पड़ता है... शायद वर्तमान खाई नहीं है, खाई कोई और चीज है और वर्तमान उसमें गिर गया है... एम.एस-सी. तकरीबन कर चुका हूं, कल आखरी पेपर था। थोड़े-से दिनों में उसकी सनद मिल जाएगी, पर इस सनद को अगर मैं दीये की तरह जला लूं तो यह मेरा वर्तमान ढूंढ़कर नहीं दे सकती.... यह कब खो गया था, कहां खो गया था, कुछ पता नहीं...

गये साल उस दिन तक याद है, जब मेरे होस्टल के चार दोस्तों ने मेरे कमरे में आकर मेरे हाथ से किताब छीन ली थी... ‘‘मैं केवल उर्फ कालीदास आज किसी मेघ का नहीं, रम का दूत बनकर आया हूं, उठो दोस्त ! आज ड्राई वेल पार्टी होगी।’’ केवल ने कहा था, और मेरी मेज पर पड़ा हुआ सिगरेट का पैकेट उठाकर अपनी जेब में डाल लिया था। नलिन ने मुस्कराकर कहा, ‘‘लड़का है या हुक्के का पानी ? तुझे यह भी पता नहीं ड्राई वेल पार्टी क्या होती है ?’’ इस नलिन को सब दोस्त ‘हेयर ऑफ हेनरी मिलर’ [हेनरी मिलर का वारिस] कहते हैं। जावेद, जिसे सब शैले लखनवी कहते हैं, वह मेरे हाथ में पकड़े हुए सिगरेट को पीता और उसकी राख मेरे ऊपर झाड़-कर शेर पढ़ने लगा था, ‘‘एक सिगरेट से लेकर एक इश्क तक हर चीज अमल है, यह बात अलग है कि कइयों को एक ही ब्रैंड चाहिए...’’ मैं अपने बालों में से सिगरेट की राख झाड़ने लगा था, और जावेद ने शेर पूरा करते हुए कहा था, ‘‘एक ही ब्रैंड की अकीदत आशिक होने की निशानी है।’’

चौथा, रावल न होस्टल में रहता है न कालेज में पढ़ता है, पर अपने घरवालों के लिए वह कालेज में भी पढ़ता है और होस्टल में भी रहता है-अपने आपको ‘रोज स्कालर’ कहता है, वह मेरे कान को धीरे से पकड़कर कहने लगा था, ‘‘मिस्टर आउट आफ डेट ! उठो, जल्दी करो। रम को बोतल की कैद से जल्दी छुड़ाना चाहिए...’’ ‘ड्राई वेल पार्टी’ का रहस्य मुझे होस्टल से एक मील एक वीरान जगह पर एक सूखे हुए कुएं पर जाकर पता लगा था। कुएं की चरखी से रस्सी बांधकर, रस्सी के एक सिरे से एक बड़ी भारी बाल्टी बांध दी थी। इस बाल्टी में बारी-बारी एक कोई बैठ जाता था और कुएं में उतर जाता था।

लड़कियों के होस्टल में से पांच लड़कियां भी आई हुई थीं, सबके नाम याद नहीं-एक जो बहुत बातें करती थी उसे सब ‘मिस स्टेटमैंट’ कहते थे। एक जो बहुत चुप थी, उसे ‘मिस मिस्ट्री’ कहते थे। एक का कद छोटा था, उसे ‘मिस शार्ट स्टोरी’ कह रहे थे। और एक जो हर बात में दखल दे रही थी, उसका नाम ‘मिस क्रिटिसिज्म’ था। पांचवी तरीज़ा थी। उसके लिए उन्होंने मुझसे पूछा कि उसका क्या नाम होना चाहिए ? मैंने उस वक्त कुछ कहना था कह दिया था, ‘पोएम इन मेकिंग !’’ हम सब एक ही बार कुएं में नहीं जा सकते थे, दो जनों को बारी-बारी बाहर ठहरना पड़ता था-चरखी की रस्सी खींचकर अन्दर जाने वालों को बाहर निकालने के लिए।

पहली बार मैं और तरीज़ा बाहर रहे थे। बाकी सबको रम पीने की जल्दी थी। जावेद उर्फ शैले लखनवी ने कुएं में उतरते हुए रम की बन्द बोतल को सूंघकर और झूमकर कहा था, ‘‘गंगाजल से लेकर वोडका तक, यह सफरनामा है मेरी प्यास का...’’ नलिन, जो हेनरी मिलर का वारिस था, उसने जावेद की कमीज का कालर खींचकर कहा था, ‘‘शैले लखनवी के बच्चे ! रम को हाथ में पकड़कर वोडका का शेर पढ़ता है ? यह सरासर रम की इन्सल्ट है। शेर जोड़ना है तो रम का जोड़-’’ शैले लखनवी को कहने के लिए कुछ न सूझा तो केवल कालीदास ने उसके कालर को छुड़ाते हुए कहा था-‘‘अरे रम क्या और वोडका क्या-अंडर द क्लाथ्स वी आर मेड इन इण्डिया !’’

और फिर कुएं में उतरकर वह गाने लगा था, ‘‘अंडर द क्लाथ्स...’’ बाकी सब उसके साथ गा रहे थे, ‘‘वी आर मेड इन इण्डिया...’’ आवाजों से कुआं भरा-सा लग रहा था। फिर कुएं में रिकार्ड प्लेअर बजने लगा था। सारे डांस कर रहे थे। मैं कुएं की मेंड के पास खड़ा सिगरेट पी रहा था..रिकार्ड प्लेअर में से उस वक्त आवाज आ रही थी, ‘‘आई हेव कन्फीडेन्स इन सन-शाइन।’’ मेरे पास खड़ी तरीज़ा ने पता नहीं क्यों पूछा था, ‘‘मिस्टर मलिक ! आप एम.एस-सी के बाद क्या करोगे ?’’ यह मेरा एम.एस-सी का फाइनल साल शुरू हुआ था, पर जो कुछ सोचना था, अगले साल सोचना था, मुझे उस वक्त तक यह पता जरूर था कि यह मेरी उम्र, मेरे सपने, मेरे पास हैं, मेरे सामने...मैं कुछ भी कर सकता हूं...मुस्कराकर कहा था, ‘‘कुछ भी कर लूँगा...’’

पर यह पिछले साल की बात है....सूरज अब भी उगता है, पर सूरज की धूप में यकीन करने वाला-मेरे भीतर का कुछ-अब सूरज की धूप में यकीन कर सकता है, न बादलों की छांव में... इस ‘कुछ’ को मैं एक पात्र की गीली और गर्म आंख से नहीं, एक दर्शक की सूखी और ठंडी आंख से देखना चाहता हूं-पर अभी तक नहीं पता चलता है कि इस ‘कुछ’ ने किस वक्त मेरी आंख बचाकर अपना जन्म बदल लिया था-यह तो कुछ इसने बदला है, यह चोले की तरह नहीं, सचमुच एक जन्म की तरह है... मुझे याद है-उस दिन मैं कुएं की मेंड के पास चुप खड़ा था, पर मेरे और तरीज़ा के दरम्यान यह चुप किसी तरह भी भारी नहीं थी-यह धीमे से हवा की तरह सरक रही थी...

तीराज़ा की जगह होकर मैं कुछ नहीं कह सकता, पर अपनी जगह यह जरूर कह सकता हूं कि खामोशी की सरकती हवा में से मैं उस तरह की ताजा सांस ले रहा था-जिस तरह कोई भी एक बेलगाव आदमी ले सकता है। केवल, कालीदास और मिस स्टेटमैंट कुएं से बाहर आ गए, और अपनी जगह उन्होंने मुझे और तरीज़ा को कुएं में भेज दिया। कुआं पानी की जगह आवाजों से भरा था-मुझे अपना आप, जाने क्यों, वहां डूबता-सा लगा-जेब में हाथ डाला, एक सिगरेट खोजने लगा-उस वक्त एक सिगरेट की जरूरत कुएं में लटकती उस रस्सी की तरह थी जिसे डूबते समय कोई थाम ले। जेब में कोई सिगरेट नहीं था। केवल मेरे कमरे से मेरा पैकेट उठा लाया था, और शायद कोई सिगरेट अब भी उसमें बचा हुआ था, पर वह पैकेट केवल की जेब में था, और केवल उस वक्त कुएं से बाहर मेंड पर खड़ा था।...जावेद ने मेरी सिगरेट टटोलती उंगलियों में एक सिगरेट थमा दिया और अपने लखनवी अन्दाज में कहने लगा, ‘‘इस समय रीजेंट नहीं हुजूर, जो सामने आया है पी लो !’’

 

 

मैंने सिगरेट सुलगा लिया था पर मेरे गले ने इस नई और अजनबी महक को कबूल नहीं किया था। जावेद ने देख लिया था, और मेरे पास होकर कहा था, ‘‘यही आसार होते हैं किसी आशिक की आयी मरने के। मैंने तुम्हें आज बताया था कि एक ब्रैंड की अकीदत आशिक होने की निशानी है...’’ और फिर जावेद ने जाने क्यों एक बार तरीज़ा की ओर देखकर दोबारा मेरी ओर देखा था-ऐसे जैसे अपनी पलकों से उसके चेहरे की कुछ नरमाई उठाकर उसने मेरी आंखों में डाल देनी चाही थी। मुझे जावेद पर एक गुस्सा आ गया था और तरीज़ा से एक शर्मिन्दगी। रिकार्ड बज रहा था, ‘‘डार्क मून ओ अप इन द स्काई, टेल मी वाईटेल मी वाई-आई हेव लॉस्ट माई लव...’’ मिस क्रिटिसिज्म ने तरीज़ा का हाथ मेरे हाथ में देकर हम दोनों को अपने नाच में शामिल करना चाहा था। मैंने तरीज़ा का हाथ पकड़ लिया था, पर गीत की लय के साथ लचकती तरीज़ा के कान में धीरे से कहा था, ‘‘मून इज़ द सिम्बल आफ नान बीइंग।’’ [चांद अनस्तित्व का प्रतीक है।] तरीज़ा हंस दी थी, ‘‘अच्छा फिलासफर साहब !’’ और मैंने जावेद की डाली हुई खामखाह की झिझक को उतारने के लिए तरीज़ा के सिर पर एक हल्की सी चपत लगाई, ‘‘तुझे यह सिली सांग्ज़ अच्छे लगते हैं ? तू अभी बिल्कुल छोटी-सी बच्ची है..’’

कुएं से बाहर आने की अभी मेरी बारी नहीं थी, पर रम का और जावेद के दिए हुए सिगरेट का जायका मेरी छाती में नहीं उतर रहा था। मैं बाहर आ गया। तरीज़ा ने भी बाहर आना चाहा, मैंने इन्कार नहीं किया। बाहर कुएं की मेंड पर खड़ा केवल मेरे पैकेट का आखिरी सिगरेट पी रहा था। मैंने दूर तक नजर दौड़ाई सिगरेट की कोई दुकान नजर नहीं आ रही थी-कोई छोटी-सी दुकान होती भी तो वहाँ से रीजेंट नहीं मिल सकता था। तरीज़ा होस्टल की लड़की नहीं थी, डे-स्कालर थी। बाकी लड़कियों से वह इकरार लेकर आई थी कि अंधेरा होने से पहले उसे घर पहुँचा देंगी। मैं सिगरेट की तलाश में जाने लगा, तो मिस स्टेटमैंट ने मुझे कहा कि मैं तरीज़ा को रास्ते में घर छोड़ता जाऊं। सिगरेट की कोई बड़ी दुकान नजदीक नहीं थी, पर तरीज़ा का घर दूर नहीं था। तरीजा़ से रास्ता पूछकर मैं उसे उसके घर ले गया। ‘‘मिस्टर मलिक, आप दो मिनट मेरे साथ अन्दर आ जाइए-हमारी कोठी की ऊपरी मंजिल में जो हमारे किरायेदार रहते हैं मिस्टर पटेल, मेरा ख्याल है वह रीजेंट पीते हैं-आप एक मिनट बैठना, मैं उनसे एक सिगरेट मांग लाऊंगी।’’ तरीज़ा ने कहा था। और मैंने जवाब में कहा था। और मैंने जवाब में कहा था ‘‘नानसेन्स !’’ पर तरीज़ा के चेहरे पर एक छाया सी आ गई तो मैं खड़ा रह गया। कोई पल जाने कैसे होते हैं, ठंडे चाकू की तरह इन्सान की जिन्दगी को काट-कर दो टुकड़ों में कर देते हैं।... तरीज़ा ने अपने घर के ड्राइंगरूम का पर्दा सरकाया, मुझे अन्दर जाने का इशारा किया, और खुद पीछे चली गई-शायद ऊपरी मंजिल में रहने वाले मिस्टर पटेल से मेरे लिए एक सिगरेट मांगने। कमरे में हरे रंग की हल्की-सी रोशनी थी, खिड़कियों के आगे मोटे पर्दे लटके हुए थे, इसलिए कमरा बाहरी रोशनी से नहीं भीतरी रोशनी से जग रहा था-जग रहा नहीं, सुलग रहा था। कमरे के जिस कोने में हरे शेड वाला लैम्प था, वहां रोशनी गाढ़ी-सी थी, बाकी कमरे की सब दीवारों पर रोशनी सिर्फ पुती हुई लगती थी-हल्की-सी जैसे किसी ने दीवारों पर रोशनी की एक कूंची फेरी हो। कमरे में दो बुत थे-एक मर्द का, एक औरत का। मर्द बुत की उपमा के लिए मुझे जल्दी से एक लफ्ज़ सूझ आया था-‘रोमन फिगर’ पर दूसरे बुत के लिए कुछ नहीं सूझ रहा था... बहुत छोटा था जब मां से कोई कहानी सुनते हुए कोहकाफ की परी की बात सुनी थी, पर परी लफ्ज़ के साथ मेरी बाल-यादों में पंख लफ्ज़ भी जुड़ा हुआ था, क्योंकि कहानी की परी अपने पंखों से उड़ती थी, कमरे में बुत की तरह बैठती नहीं थी। इसलिए मेरा ख्याल है मैं दूसरे बुत को देखकर उस वक्त उसके साथ ‘कोहकाफ की परी’ लफ्ज़ नहीं जोड़ सकता था। और कोई इसके अलावा और बड़ा लफ्ज़ मेरी यादों के साथ जुड़ा नहीं था... सुना हुआ था कि तरीज़ा किसी रईस बाप की बेटी थी-उसके मरहूम बाप की शोहरत अमीरी के लिहाज़ से सुनी हुई थी, पर उसके किसी हुनरी शौक के लिहाज़ से नहीं। हैरान था-ऐसे बुत बनवाने के लिए उसने कोई बुत-तराश कहां से पाया होगा। दोनों बुत एक से हसीन थे, सिर्फ एक फर्क था-मर्द का बुत सफेद सिल्की मिट्टी से बना दिख रहा था, और औरत का टसरी रंग की मिट्टी का बना हुआ-इन्सान के कुदरती मांस जैसे रंग का। कुछ हिला-मेरी आंखों के सामने कमरे में। पर मुझे लगा कि यह मेरी आंखों का अचम्भा था, जो आंखों से बाहर नहीं, आंखों के भीतर हिल रहा था, बाहर सिर्फ उसका साया था। अजीब बात थी कि साया सिर्फ एक बुत पर इकट्ठा हो गया था-औरत के बुत पर क्योंकि सिर्फ औरत का बुत हिल रहा था। मर्द का बुत उसी तरह अडोल था...

मेरे हाथों को कुछ छुअन-सी महसूस हुई-मैं शायद कुछ चौंक गया था-देखा, मेरे पास खड़ी तरीज़ा हंस दी थी। वह एक सिगरेट मेरे हाथ में पकड़ा रही थी।

और फिर तरीजा़ की आवाज आई ‘‘ममी ! यह मेरे कालेज में पढ़ते हैं, मिस्टर मलिक....हम एक पिकनिक पर गए थे...’’ तरीज़ा उस तरफ देखकर कह रही थी, जो अभी मेरी आंखों के सामने मेरे ख्याल से एक बुत था... मैंने शायद हाथ जोड़े थे या सिर्फ सिर झुकाया था, मुझे याद नहीं। शायद मैंने कुछ भी नहीं किया था-पर जो कुछ भी नहीं कर सका था, जो इस ना कर सकने में, जुड़े हुए हाथ भी शामिल थे, और झुका हुआ सिर भी।... किसी बुत के अचानक किसी घड़ी होंठ मुस्करा पड़े हों, किसी ने नहीं देखे होंगे, मैंने देखे थे... होंठ हिलते भी देखे। कमरे में धीमे से सरकते हवा के झोंके की तरह आवाज आई, ‘‘मिस्टर मलिक ! आओ बैठो...’’ नहीं, आवाज हवा के झोंके की तरह नहीं थी, एक ठोस चीज की तरह मेरी तरफ आई थी, क्योंकि मुझे लगा कि मेरे सारे बदन को कुछ छू गया था।–छू गया नहीं, टकरा-सा गया। इतना कि मैंने पास पड़ी एक कुर्सी पर अपनी बांह रख दी... ‘‘प्लीज मलिक, दो मिनट बैठो !’’ यह तारीज़ा की आवाज थी और वह कह रही थी, ‘‘मैं सिगरेट ले आई, पर माचिस लाना भूल गई, ‘‘और फिर वह मेरी तरफ नहीं दूसरी तरफ देखकर कह रही थी, ‘‘ममी सिगरेट पीने का बुरा नहीं मानतीं, मैं माचिस, लाती हूँ।’’ माचिस मेरी जेब में थी, मैंने निकालकर हाथ में पकड़ ली। तरीज़ा रुक गई। पर मैंने सिगरेट जलाया नहीं-सिर्फ उस बुत की तरफ देखता रहा, जो अभी तक हिला नहीं था, शायद मैं उसके हिलने का भी इन्तजार कर रहा था... पर यह दूसरा बुत हिला नहीं, सिर्फ मेरी आंखें उस पर हिलती रहीं-शायद उसे हिलाकर देखती रहीं...

‘‘यह बुत आपको कैसा लगा है ? तरीज़ा की आवाज आई। जवाब में कुछ कहने लगा था-शायद वह बात जो अभी-अभी गुजरी थी-पर मेरे होंठ जरा-से हिलकर रह गए ? ‘‘वह बुत आपको पता है किसने बनाया है ?’’ तरीज़ा की आवाज आई। जवाब में मैंने तरीज़ा की तरफ देखा-कहने लगी, ‘‘ममी ने...बहुत साल हो गए हैं। मैं तब छोटी-सी थी, जब ममी ने यह बुत बनाया था-ममी ने स्कल्पचरिंग सीखा था, पर सिर्फ एक बुत बनाया, और फिर सब छोड़ दिया-’’ मैंने उस तरफ देखा, जिधर तरीज़ा देख रही थी-वहां ना गरूर था ना पछतावा। कुछ था जरूर, पर मैं उसे कोई नाम नहीं दे सकता-समथिंग नेमलेस’...[कोई चीज-अनाम]

मैं चुप था, पर चुप भी, शायद एक जबान होती है...और वह जबान, मैंने पहली बार सुनी-सिर्फ सुनी, समझी नहीं... समझने की कोशिश कर रहा था, कि मेरी जबान पर ‘आठ’ लफ्ज़ आने लगा-कुछ तालू से लगा हुआ, कुछ जबान पर सरकता-सा- और फिर लगा कि मैं-सामने उसके गले में पहने हुए डेसिंग गाऊन जैसी चीज पर उभरे हुए फूल गिन रहा था, एक...दो...तीन...चार...पांच..छै...सात...आठ....

एक बार गिनती खत्म होती थी दूसरी बार शुरू कर देता था-आंखों को और सोच को शायद जल्दी से कोई सहारा चाहिए था...यह ड्रेसिंग गाऊन जैसा जो भी कुछ था। टसरी रंग का था, इन्सानी जिस्म की जिल्द के रंग का। जिस्म के साथ जिस्म का हिस्सा सा...इसीको मैंने थोड़ी देर पहले, उस मिट्टी के रंग में सोचा था जिससे मुझे यह बुत गढ़ा हुआ लगा था...और अब शायद जिस्मानी हकीकत पर यकीन करने के लिए मैं उसके गले में पड़े कपड़े पर के फूल गिन रहा था....

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