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दो

बाप रे, एक मेरा कहना मान ले


मुझे ‘रामरत्न’ वर दे दे


बेटी, ‘रामरत्न’ ने सिर पर सेहरा बांध लिया

 

जाने बागों में क्योड़ा खिल उठा !...

सुहाग-गीतों के कान तो जरूर होते हैं, पर आंखें नहीं होतीं। जब भी कोई सिर पर सेहरा बांध कर खड़ा हो जाता है, इन गीतों को वह ‘रामरत्न’ ही दिखाई देता है। लखेशाह ने भी जब कैली से विवाह करने के लिए सिर पर सेहरा बांधा तो सुहाग-गीतों ने अपनी आदत के अनुसार गाना शुरू कर दिया,

‘‘बेटी, ‘रामरत्न ने सिर पर सेहरा बांध लिया...’’

और लखेशाह ने लोकगीतों के द्वारा अपना नाम ‘रामरत्न’ रखवाकर कैली ब्याह ली।


चाहे कैली एक लोकगीत की ज़बानी कहती रही थी,

‘‘बाप रे, मुझे इस घर में देना जहां सास के सात बेटे हों; बाप रे, तेरा पुण्य होगा !’’ पर बाप के कान शायद बहरे थे; इसे यह बात कुछ उलटी-पुलटी सुनाई दे गई...


कैली जब ससुराल गई, उसने देखा उसकी सास का बेटा तो एक ही था- वही लखेशाह, पर उसकी सौत के बच्चे तीन जरूर थे। और कैली सोचने लगी कि तीन के स्थान पर पूरे सात भी होते तो क्या हर्ज था ! वैसे दूसरे ही दिन कैली को पता लग गया कि यदि उसकी सौत का पहला बेटा भी जीवित रहता और बीच की लड़की चेचक निकलने से मर न जाती, और दो बेचारे सतमासे ही न चल बसते, तो असल में पूरे सात ही होने थे... विवाह के सारे गीत इस तरह उल्टे हो गए जाने किस्मत ने भूल से फुलकारी का उलटा ओर सिर पर ले लिया हो, और सारी गांठे और टांके ऊपर की ओर आ गए हों...


कैली का मुंह जुठारते हुए लखेशाह की इधर-उधर की तथाकथित बहिनों ने जिस दिन यह गीत गाया-

‘‘भाभी एक, ननदें चार, मुंह जुठारें बारो-बार।’’

उसके तीन दिन बाद जब वे ननदें चुनरी-मिठाई लेकर अपने-अपने घर चली गईं, तो कैली लखेशाह के तीनों बच्चों को मूढ़ों पर बैठाकर बारी-बारी उनके मुंहों में निवाले देने लग गई।


बड़ा लड़का चाहे आठ-नौ वर्ष का था और मुंह में कौर लेने योग्य नहीं था, पर कैली जब से आई थी वह नाराज़ बैठा था। पिछले तीन दिनों से उसने रोटी की थाली की ओर देखा भी नहीं था, इसलिए कैली उसे बांह से पकड़कर मूढ़े पर बैठा, और कौर तोड़कर उसके मुंह में डालने लग गई थी...


उससे छोटा लड़का छः वर्ष का था। वह जब डेढ़ वर्ष का था, घुटनों चलते हुए वह छत पर से गिर गया था और एक ईंट की नोक उसके सिर में लग गई थी। बड़ी कठिनाई से वह बच तो गया था और उसकी उमर अपने रास्ते चल पड़ी थी, परन्तु उसकी दिमागी हालत वहीं खड़ी रह गई थी। बोलते समय उसकी ज़बान हकलाती थी, और सुनते समय भी उसे बात पूरी तरह समझ में नहीं आती थी। वह खुद रोटी खा लेता था, पर बुरी तरह कमीज़ पर दाल गिरा लेता था, सारे मुंह पर सालन लगा लेता था, इसलिए कैली उसकी बांह पकड़ उसे मूंढ़े पर बैठा, कौर तोड़कर उसके मुंह में डालने लग गई थी।


सबसे छोटी लड़की चार वर्ष की थी। उसके दायें हाथ पर कितने ही दिनों से एक फोड़ा हो रहा था। विवाह की भीडभाड़ में कई बार उसका हाथ दुःख गया था जिसके कारण फोड़े की टीस बहुत बढ़ गई थी और उससे अब रोटी का ग्रास तोड़कर खाया नहीं जा रहा था। इसलिए कैली उसे अपने हाथों से खिलाने लगी।


बड़े लड़के का नाम सोहन था, उसका रंग सांवला था, इसलिय सभी उसे ‘काला’ कहकर बुलाते थे। छोटे का नाम किसी ने रखा ही नहीं था, जब से उसकी ज़बान हकलाने लगी थी, सारे उसे ‘लोला’ कहकर बुलाने लगे थे। छोटी लड़की की आंखों में सब्ज-सी झलक थी, इसलिए सभी ने शुरू से ही उसका ‘बिल्लो’ नाम रख दिया था।

कैली जब काले, लोले और बिल्लो को रोटी खिलाने बैठी, तो वह एक ढकने में विवाह की बची हुई मिठाई निकालकर ले आई। वह बच्चों का मुंह मीठा कराने लगी थी, जब लखेशाह ने जल्दी से कहा,

‘‘मैंने कहा, यह मिठाई रहने दे, यह तो अभी चार दिन काट जाएगी। पिछले अन्दर देख, एक टीन और पड़ा हुआ है उसमें मेरे भाई के विवाह की मिठाई बची पड़ी है, पहले उसे बरत ले।’’


यह लखेशाह का कौन सा भाई था ? उसका विवाह हुए कितने दिन हुए थे ? कैली को कुछ पता नहीं था। पर कैली ने जब पिछले अन्दर से मिठाई का टीन ढ़ूंढ़ा, पत्थर जैसी सूखी हुई मिठाई को देखकर उसे ख्याल आया कि हो न हो, अब वह ढकने में मिठाई डालकर ले जाएगी तो लखेशाह कहेगा,

‘मैंने कहा, यह मिठाई रहने दे, यह तो अभी दो दिन काट जाएगी। पिछले से पिछले अन्दर देख, एक टीन और पड़ा हुआ है, जिसके बीच मेरे बाप के विवाह की मिठाई बची हुई है- पहले उसे बरत ले...,

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