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कोई महरम नहीं मिलता जहाँ में

Altaf Hussain HaliAltaf Hussain Hali
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कोई महरम नहीं मिलता जहाँ में

मुझे कहना है कुछ अपनी ज़बाँ में

क़फ़स में जी नहीं लगता किसी तरह

लगा दो आग कोई आशियाँ में

कोई दिन बुल-हवस भी शाद हो लें

धरा क्या है इशारात-ए-निहाँ में

कहीं अंजाम आ पहुँचा वफ़ा का

घुला जाता हूँ अब के इम्तिहाँ में

नया है लीजिए जब नाम उस का

बहुत वुसअ'त है मेरी दास्ताँ में

दिल-ए-पुर-दर्द से कुछ काम लूँगा

अगर फ़ुर्सत मिली मुझ को जहाँ में

बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर

अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जहाँ में

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