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नया साल (कविता ) 
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गाँव में
चौखट पर बैठी,
शहर में रहने वाले
बड़े बेटे के लौटने का
इंतज़ार करती...
बूढ़ी माँ की बची सांसें है
नया साल.

या फिर यूं कहें बूढ़े बाप की लाठी,
मोतियाबिंद,
चेहरे की झुर्रियां,
या ठूँठ होता बरगद.

अगर नहीं?
तो कह लीजिए
कोने में सुबकती
आईने से बातें करती
पिया-पिया कहती
उस पत्नी के माथे
का सिंदूर.

अगर ये भी मुमकिन नही
तो कह लीजिए 
ज़िंदगी और मौत,
ख़्वाब और हक़ीक़त
से लड़ता वो बेटा
जिसे अब भूख कम लगती है
जो अब रोना भूल गया है.

नया साल और कुछ नही
बहता हुआ 'नीर' (पानी) है
जिसमें नही देखी जाती 
अब अपनी ही तस्वीर.
-नीरज नीर

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