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"एक कविता"

RohitRohit March 19, 2022
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कभी रात,
सिसक के रह गई
कभी दिन,
उफन के रह गया
कभी शाम,
सज के उजड़ गई
कभी सुबह,
सुबह-सुबह ही मर गई
ना उससे कुछ कह हुआ
ना मुझसे कुछ कह हुआ
इशारे भी हुए तो, बीच में
सदा ही अजब-सा डर रहा
वो मेरे सपनों में चहकती है
उसकी हालत कुछ पता नही
ये दास्ताँ तो सच है!
किसकी है, कुछ पता नही !!
- रोहित 

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