सलीक़ा's image
Share2 Bookmarks 203 Reads8 Likes

ढ़ल रहा था सूरज

क्षणों में था इत्मीनान,

मिटता गया था सारा

उनका भी गुमान


चांदनी बिखरी थीं फिर

धरा पर कुछ ऐसे,

अंधेरे को मार्मिक

स्पर्श दे रही थीं वो जैसे


कठोर बातों का ना

निकला था कोई निष्कर्ष,

भले हो चुकी थी बहुत

दिमागी विचार-विमर्श


दख़ल हो चुकी थीं

पूरी तरह से खत्म,

रह गया था फिर भी

एक मीठा सा ज़ख्म


हो जाती जैसे

राख सारी भस्म,

हो गई थीं वैसे ही

पूरी रूठने की रस्म



अधूरी गाथा क्या

होगी पूरी मंज़ूर,

एक मुसाफिर उनमें से

क्या जाएगा कोसों दूर?


सवालों का घेरा

सिमटता जाएगा,

इक दूजे में से पहले

कौन किसे माफ़ कर पाएगा



सलीक़ा उनका उन्हें

गहन बोध कराएगा,

यादों के सहारे थोड़ी

कोई किसी को कठघरे में लाएगा



सदियां बीतने साथ

सारा कुछ स्पष्ट हो जाएगा,

कष्ट सारा मोम जैसे

लौ जलते पिघलता जाएगा।




- यति

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts