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अरसा गुज़रा हुए मिलाप एक मुख़्तसर!

कहो क्या रही बाकी हमारी दोस्ती में कसर?

क्या फ़ासला न करता तुम्हारे हृदय पर असर?

उम्मीद हैं हौसलों से भरपूर हैं तुम्हारा सफर!


आजकल सुनने न मिलती तुम्हारी रिवायत!

क्या गुम हो चुकी वो अनोखी पुरानी रूहानियत!

क्या बड़े होने पर विलुप्त हो चली मासूमियत?

देखो! दूरी के लिए दोषी ठहरा रहे हम अपनी ही नियत!


मगर फिर पढ़ना मुझे तुम्हारे हाथों से लिखे ख़त,

नज़दीकी बरकरार रहे ऐसे प्रयास होंगे मेरे सतत,

भिन्न हो सकते हमारे एक दूजे से भले ही मत,

किंतु चाहेंगे भला एक दूजे का ये जानती मैं शत प्रतिशत!


- यति








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