कोपल :)'s image
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कंचन सा उसका हृदय,

मन में नहीं ज़रा भी भय,

अनोखी निरंतर उसकी लय,

विश्वास रखे प्रतिकूल हो चाहे समय,

ओजस जिज्ञासा देखो लिए!

प्रज्वलित अनेक भीतर उसके दिए,

कभी शोध में रहती वो गहन!

कभी नम कर लेती वो नयन,

आहिस्ता प्रक्रिया हर करके सहन,

बदलाव को लाना ठानी अपने ज़हन!

सच को अपनाकर लाना उसे अमन,

नकारती सबूत से सभी फिज़ूल कथन!

कभी जुगनू जैसे जगमगाती,

कभी तारों सा टिमटिमाती,

कभी कुमुद जैसी वो खिलती,

कभी मुरझाने पर डाल से गिरती,

मुरझाने पश्चात माटी संग ही मिलनी,

इसलिए मुखड़े से ज़्यादा उसकी सीरत सलोनी!

कवियित्री की कल्पना हर रूह को सराहती!

वो प्रकृति को घर सा शनैः शनैः दुलारती,

प्रकृति प्रेमी जैसे हर बदलाव को सराहते,

हर रूप में छिपे भेद को वो पहचानते!

फिर टहनियों में देखते कोपल कभी उभरता!

बिछड़ते पत्तों संग पतझड़ में वो फिर बिखरता!

मिलता धूप छांव में वो बिखरे पत्तों वाली गली;

स्वीकृति संग बेहतरी की आशा लगती कितनी भली।



- यति














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