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नज़रें कभी नम सी रहती,

हौले से ग़म यें सोख लेती,

कभी बिलख़ कर रो पड़ती,

कभी सब भूल चैन से सो लेती,

कभी अश्रु की धार न इनसे रुकती,

कभी नज़ाकत में निर्मल हो झुकती,

बैर से पनपा रोष भी इन नज़रों में ही दिखता,

कुछ चिट्ठियों को चुपके चुपके जैसे कोई लिखता,

प्यार की गहराई मापने का भरोसा इनपर टिकता,

कभी इन पर पट्टी बांध झूठ इनको बिकता,

आनंद के क्षणों में भी इनमें पानी भर आता,

हरित प्रकृति का दृश्य इन्हें किंतु हमेशा भाता,

इनके कोनों से सुरमा लगाकर लगता गोल टीका,

कजरारी आंखों के समक्ष होता हर श्रृंगार फीका!



- यति






"The tongue may hide the truth but the eyes—never!"









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