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ज़िंदगी किताब सी हो गई!

Yati Vandana TripathiYati Vandana Tripathi November 7, 2021
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पलकों पर बेहिसाब नींद,

जज़्बा ख्वाइशों का मुरीद,

अनगिनत रातें जाग,

बेबसी से कहीं दूर भाग,

अंदर लिए जुनून की आग,

शक्ति ने चुना मिलाप को प्रयाग,

निखरते समस्त अंदरूनी राग,

तपस्या से पाया कुछ ऐसा बैराग,

मानो दरख़्त से बिछड़ते पत्ते हज़ार ,

दे रहें रूठे दिल को क़रार,

ये दुनियादारी का बाज़ार,

गुम हैं यहां प्यार को करने वाले स्वीकार,

अब एकांत से करता हृदय ऐतबार,

विस्मयकारी हुनर भी सबमें मौजूद,

संदेह संग ना आंकना फिर किसीका वजूद,

चुनौतियों के चरम को लिया मैंने पहचान!

नक़ाब उतरते सारा मौहल्ला हो गया सुनसान,

स्याही ही तो सिखलाती त्यागना जी हुज़ूरी,

बतलाती जज़्बातों को दर्शाना कितना ज़रूरी!

हर किसी की यहां फिर भी कोई मज़बूरी,

जिंदगी से मांगे सबकी हमेशा कब हुई हैं पूरी?

कहानी वो भी दिलचस्प हैं जो रह गई अधूरी,

जज़्बातों को पनाह देने छोड़ दी जगह मैंने कोरी।



- यति



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