कृतार्थ's image
Share0 Bookmarks 8 Reads0 Likes
एक सपने का उधार है मुझपे 
जो हर रात चुकाना पड़ता है
दबती-थकती आंखों को हर रात जगाना पड़ता है
अज्ञात सा पथिक हूँ मैं
अज्ञात सी राहो का
हर त्याग सह के जीवन को 
कृतार्थ बनाना पड़ता है 
जलती चुभती राहो पे पैरो को चलाना पड़ता है
माँ का आँचल त्याग कर घर को भूलना पड़ता है
एक सपने का उधार है मुझपे 
जो हर रात चुकाना पड़ता है।।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts