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"वजूद" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र November 17, 2022
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अल्फाजों से बयाँ न कर इश्क़ खामोशी से जताया जाय,
जज्बातों को दें जिन्दगीं तो फिर न बाज़ार सजाया जाय,

ख्वाब पड़े हैं अधूरे अपने वालिदों के वतन की माटी में,
पैदा कर वहीं रोटी अब फर्ज ए वतनपरस्ती निभाया जाय,

ढूंढेंगे ले चिराग तो मिल न सकेगा कभी भी अंधेरा हँस के,
है उसका भी कुछ वजूद कभी तो पलकें झपकाया जाय,

आये कभी जो वो सिर्फ दिखाने हमें छाले अपने पैरों के,
छोड़ बेचना दवाएँ बना हमसफर हमदर्दी जतलाया जाय,

माना कि है जायज जीतना सब कुछ मोहब्बत और जंग में,
पर ए दिल हरदम मोहब्बत ही को तो न जंग बनाया जाय,

                              *****

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