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Kumar VishwasPoetry1 min read

"सूर्य देखे दिया" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र March 9, 2022
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एक दिन अच्छा अवसर तककर,

जब दीप के सम्मुख था दिनकर,

तानों से उपजी सब कुंठा तजकर,

कहा खुद ही की लौ में सिमटकर,


   जल को निज अर्ध्य का हक देकर,

   मुझसे पूजन थाल सा गगन लेकर,

   आपके दर्शन का मेरा मन मार दिया,

   समदर्शी सा नहीं यह व्यवहार किया,


उलाहना दीपक की यह सुनकर,

बोले सूर्यनारायण थोड़ा हँसकर,

तम ने तेरे नीचे अधिकार किया,

क्या नहीं मैंने तुझको प्यार दिया,


   हर शाम ढला मैं जब थककर,

   तेल कपास व माटी में भरकर,

   आत्मतत्व अग्नि उपहार दिया,

   तुम्हें प्रतिनिधि स्वीकार किया,


मुझे दिखाने वाले ताने से डरकर,

मत आना अब तुम आँसू भरकर,

तुझको अपना सब संसार दिया,

देव पूजन का भी पहरेदार किया,


   गूढ़ जगतपिता की बातें गुनकर,

   लौटा दीप निज लक्ष्य समझकर ,

   मन तम का सकल विनाश किया,

   उजियारा भरकर आकाश जिया,

   

   

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