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"पञ्च - पल्लव" / "अजान" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र July 15, 2022
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सजा जब उन सबका दरबार तो उसे सजा हो गयी,
काफिरों की क़ज़ा ही से कातिलों की मजा हो गयी,

बजा तो देते वे खुदा के बन्दे भी ईंट से ईंट बंदगी में,
ज़िंदगी उनकी दोस्ती में ही सही मौत से रज़ा हो गयी,

वक्त आया है शब बन के सहर को न कोसिये जनाब,
सूरज की तपिश ही चाँद की चाँदनी सी फ़ज़ा हो गई

कुछ इल्ज़ाम भी न लगा सका वो जुल्म ढाने वालों पे,
उसकी मासूमियत ही तो हैवानियत की नज़ा हो गयी

पैहम हुआ चीखते हुए इंसानियत का दर्द में पुकारना
खुदाई सोचती रही उनकी आज हमारी अजाँ हो गयी

- विवेक मिश्र

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