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"माँ...! मैं जिंदा हूँ" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र February 24, 2022
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भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं ज़िंदा हूँ माँ कह लेना,

सूतपुत्र उपाधित लोकनिंदा सब सूर्यपुत्र हो कर सह लेना,


अधिरथ पिता कृपा से तेरा जीवन रथ पहिया चलता हो,

श्रापित हो वक्त ही तुझको जब धर्म समर मध्य छलता हो,

राधेय नाम के आँचल भीतर सुबक नेत्रजल बन बह लेना,

भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं जिंदा हूँ माँ कह लेना,


गुरुसेवा से प्राप्त ज्ञान तेरे अपनों ही को जब खलता हो,

अन्याय क्रोध का वेग प्रबल तूफां बन सीने में पलता हो,

अंगराज जरासंध अहं से भिड़कर तुम जनहित शह देना,

भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं जिंदा हूँ माँ कह लेना,


नित सूर्य अर्ध्य बाद दान से पूर्वजन्म पाप जो गलता हो,

स्वर्ग अधिपति इंद्र भी शौर्य तेज देख तेरा गर जलता हो,

कवच कुंडल के बिन भी मित्रहित कहर शत्रु पर ढह देना,

भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं जिंदा हूँ माँ कह लेना,


कुरुक्षेत्र में गुरुवों का आशीष भी वय जरा में ढलता हो,

तेरे कौशल के सम्मुख ईश्वर कह वाह वाह सम्हलता हो,

धनुष विजय को छोड़ आयुष्य दान अनुज को चह देना,

भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं जिंदा हूँ माँ कह लेना,


हठीमार्ग के अद्भुत योद्धा का शापित जीवन फलता हो,

वीर अंत आदर्श देख शत्रु अचरज संग आँखें मलता हो,

दंतस्वर्ण दान से समा ईश में अमर हर दिल में रह लेना,

भीषणतम संघर्ष में धैर्य धर कर मैं जिंदा हूँ माँ कह लेना,


मैं जिंदा हूँ माँ...! कह लेना ..!

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