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"लाल बुझक्कड़ी" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र July 12, 2022
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बहुत सारी भेड़ें हैं,और हैं उनमें कुछ मनचली बकरी भी,
न तो चरवाहा ही दिखता न बंधी डंडे में उसकी ठठरी ही,
शेर भी बैठा ताक लगा के बीती रात उसे कुछ अखरी सी,
पदचिन्ह गज के नहीं थे धूल में हिरन ने बाँधी चकरी थी,

सियारों ने जब कहा हुआ हुआ लोमड़ी अंगूर पकड़ी थी,
रेशमी बंधन वह देती कैसे जाल बना फ़साती मकड़ी थी,
सैलाब में आ लगी किनारे जुदा पेड़ की गीली लकड़ी थी,
पदचिन्ह गज के नहीं थे धूल में हिरण ने बाँधी चकरी थी,

था हरा हमेशा भरा हुआ माँग केसरी की कुछ सकरी थी,
श्वेत की धड़कन चौबीसों घंटे नीले रंग संग ही जकड़ी थी,
भगवा भागे गंगा लाने सिंधु सरजू को कब्जाने झगड़ी थी,
पदचिन्ह गज के नहीं थे धूल में हिरण ने बाँधी चकरी थी,

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