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"इंसानी ढोंग"- विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र August 28, 2022
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उड़ा स्वर्ण चिरैया ढोर हुए हम पर ढोंग इंसानी पा लिए है,
क्या थे, क्या हुए , होंगें क्या खुद को क्या समझा लिए हैं,

खोए नहीं शब्दों ने अर्थ गैर मायने खुद में समा लिए हैं,
भीख, चंदा, सहयोग राशि, दान से खिचड़ी बना लिए हैं,
डरता हूँ कि बेरोजगार कुलदीपक केयरटेकर न कहलाये,
देश की जनता ने चाय विक्रेता चौकीदार अपना लिए हैं,
उड़ा स्वर्ण चिरैया ढोर हुए हम व ढोंग इंसानी पा लिए हैं,

रिश्तों ने छोड़ा रिसना राग दूषित प्रतिस्पर्धा गा लिए हैं,
आशीष मिलता नहीं बिकता है देव श्रीफल खा लिए हैं,
बाँधें फ्रेंडशिप बैंड रक्षाबंधन राधाकृष्ण रास है वेलेंटाइन,
त्योहारों के उल्लसित अवकाश सरकारों ने घटा लिए हैं,
उड़ा स्वर्ण चिरैया ढोर हुए हम व ढोंग इंसानी पा लिए हैं,

बेचता है बनिया चंदन पंडित बनियाइन अपना लिए हैं,
वर्ण अब रक्षित नहीं क्षत्रिय बेच आरक्षण कमा लिए हैं,
निरपेक्षता के धर्मपालन में नैतिकता हो चली निर्वस्त्र,
अनैतिकता को कुतर्की आचरण के वस्त्र पहना लिए हैं,
उड़ा स्वर्ण चिरैया ढोर हुए हम व ढोंग इंसानी पा लिए हैं,
....ढोंग इंसानी पा लिए हैं ...!

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