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"बातें" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र August 28, 2022
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राम कहाँ हैं अक्सर पूँछें अंतर्मन में आ राम की बातें,
राम को ढूंढें अपने मन में कहिये सुनिये राम की बातें,

इनकी बातें उनकी बातें हमनें सुन ली सब की बातें,
बात करे न करने वाला करतें सब स्व मन की बातें,  
राम कहाँ हैं ...............

उनने इनकी बात चुरा ली इनने भी दो बात सुना दी
बात बात में ही हो गई बेमतलब बड़े बबाल की बातें ,
राम कहाँ हैं ..............

चिकनी बातें चुपड़ी बातें हैं जितने मुँह उतनी ही बातें,
बातों का आयाम बड़ा जमीन और आसमान की बातें,
राम कंहाँ है ..............

बीते कल की और बात थी अब आज की बात दूसरी,
भविष्य का आभास करावें ऐसी हैं कुछ राज की बातें,
राम कहाँ हैं ...............

तीर सी चुभती उनकी बातें फूल सी जैसे इनकी बाते,
शहद में डूबी बातें करना कहते है वे कमाल की बातें,
राम कहाँ है.............

कुछ बातें तो बेमानी हैं वक्त की कुछ कुछ बेईमानी है,
हैं उनके फरमान की बातें नहीं कहीं अरमान की बातें,
राम कहाँ हैं ..............

रात गयी सो बात गयी रात में ढल गयीं दिन की बातें,
राम ही समझे राम ही जानें राम कहें जो राम की बातें,
राम कहाँ है .............

हँसी हँसीं में कहना बातें सम्मान व अपमान की बातें,
बात पकड़ना जुबा फिसलना सब हैं सामान्य सी बातें,
राम कहाँ है .............

आँखों आँखों में हुई जो बातें हर जुबाँ पे एक सी बातें,
इनकी उनसे उनकी हमसे उलझे सुलझे नेक सी बातें,
राम कहाँ है.........

हल्की बातें गहरी बातें मुँह तक आ के भी रह गई बातें,
बातों पे न बात करें जब बातें हों कर बचतीं केवल बातें,
राम कहाँ है .............

                              ★★★

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