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"असफल सफलता" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र November 3, 2022
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सफलता की आधुनिक परिभाषा ने इंसान को मारा है,
चिढ़ता जलता धनकुबेर सुकून क्यूँ गरीब का सहारा है,

लूटता फिर रहा वह माता का प्यार हर बच्चे के शीश से,
दे हाथों में यंत्र कर्णपिशाच व कह अब ये बाप तुम्हारा है,

रोया बाँस खोखलेपन पे बेंच स्वर बंशी का अंधभक्त को,
आधुनिककृत वाद्ययंत्रों के कंठ हेतु शोर शराबा गरारा है,

मर गया तंत्र व उसके आगे का रक्षक गण लक्ष्मी से लड़,
वजनी शस्त्र कवच वीर का धूल म्यूजियम में खा रहा है,

सींचें जवान रक्त से सीमा देश की पहन तमगा अग्निवीर
होगा धन डिजिटल किसान कम्प्यूटर के आगे नकारा है,

होगा अमर महापुरुष गढ़ के विकास गाथा अश्वथामा सा,
जीता बेच मित्रों को निज जीवन असल चुनाव जो हारा है,

विकास विनाश नहीं सुख दुःख सरीखे जो आयेगें क्रमशः
विनाश का है विकास सबके विकास में ही छिपा हत्यारा है,


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