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दिल्ली में क्या देखा...!

Vishnukant ChaturvediVishnukant Chaturvedi November 21, 2022
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दिल्ली में क्या देखा...!


एक बात है,

जो बताना चाहता हूं,

कुछ जुगुप्सा, कुछ विरह,

और हर्ष से वेदना का मुखर स्वर,

हर दिशाओं से सजी कुछ अनुभूति है,

उसी की अभिव्यंजना है, उसी की यह लक्षणा है!

आनंदविहार का साधारण दृश्य,

पर चेहरे बहुत अनजान थे,

इंगित किया गया था मैं, कि थोड़ा संभल के,

ये दिल्ली है, यहां सफाई के उस्ताद थे,

हर पहर में कोलाहल था,

हर बात में हालाहल था,

मौसम की भृकुटी ऊपर नीचे, आशंकित समय का चाल था,

गलियों, कूचों में जब कदम पड़े, तो हाल बड़ा बेहाल था,

मरघट में जैसे लड़ते मरते, गला काट स्पर्धा में,

कल की सुध की बेचैनी में पाठक हुए न काम के!

"ध्येय", "दृष्टि", और "विजन" लिए, माथे की लकीर लिए,

कर्म पल्लवन रुझान समर्पण, साधना को अभिषिक्त किए,

फिर एक नज़ारा बाहर का जब जब मैंने देखा,

पश्चिम की बू, संस्कृतियों का उपहास उड़ा मैंने देखा,

लिंग भेद बेकाबू थे, कृत्यों में अंतर न मैंने देखा,

समय की झट पट सूई बढ़ती, उसी त्वरित से भागा मैनें,

मंदिर, कब्रों की अनुशंसा में, गुरुद्वारे की मंशा में मैं,

सी०पी० के अभिजन पथ पर, या हनुमान के द्वार खड़ा मैं,

मौर्य महान का लौह स्तंभ, मध्य हिंद की मीनारों में मैं,

जैन की महिमा गाने में मैं, या आदिशक्ति की भक्ति में मैं,

जैनधर्म के शांति पगों में या हरि के गुंजनगान में मैं,

शीशमहल वाली मानव दुर्लभता, या सर्वदेशी के आलोक में मैं,

दिल्ली दिल पर राज कर गई, रंग भर गई धानी देखा,

हृदय तो जीती जब दुनिया को दिल्ली तक आते देखा,

खुद को हतप्रभ होते देखा, पर!

पश्चिम की चपेट में लिपटा, और संवेदना मरते देखा,

कहीं कहीं मर्यादा देखी तो कहीं निर्दयता भी देखी,

भिक्षामी देही से विवशता की विक्षुब्ध कालिमा भी देखी,

अनिश्चितता के बादल देखे, शम दम वक्र गणित देखा,

संबंधों को मरते देखा, संबंधों में मरते देखा,

विपरीत ध्रुवों पर टिकी मनुजता के आलिंगन को देखा,

कोटि कोटि आघातों में भी सपने को बुनते देखा,

स्वार्थपरकता भी देखा, कुछ तार तार होते देखा,

सरकारों के मेले में, संविधान के खरपच्छे देखा,

साहित्य जगत का उपवन देखा, रचना कालजयी देखा,

वर्तमान मूक न था, अनभिज्ञ न था, अपुरूषार्थ न था,

पुरुषार्थ की वेदी पर संघर्ष हुए होते देखा,

साक्ष रूप में मानव को बड़े बड़ों से लड़ते देखा,

अधिकार अनिल सी बहा करे, इस बात को होते भी देखा,

सामाजिक बुनकर देखा, तो वर्चस्व, नियंत्रण भी देखा,

भद्र इकाई भी देखा, अभद्र दहाई भी देखा,

सूट बूट में अगणित यौवन ओजरहित भी देखा,

विद्या के अर्थी तनिक दिखे, पर छात्र अगणित बहुत देखा,

नवल युवा की आंखे देखी पर सपनों का अभाव दिखा,

नाव तो देखी लहरों में, पर दिशासूचक का द्वंद दिखा,

भीड़ की मंशा में केवल औरों में खुद की तुलना देखा,

अनभिज्ञ ध्येय की परिधि में बंधी सामर्थ्य व्यर्थ होते देखा,

लूटे और लुटाए जाते बाज़ार गुलामी भी देखा!

आजादी का हवन कुंड और बलिदानी चरखा देखा,

लाल किले की दीवारों पर अभिमान तिरंगा भी देखा,

मीना बाज़ार का वर्तमान और दासत्व की परछाई देखा,

रक्तों से सिंचित धरती देखा, एक धर्म बढ़ते देखा,

इतिहास की बर्बरता देखा, मरघट की आहट देखा,

उसी कीचड़ में खिली हुई आज़ादी का पंकज देखा,

अरविंद, मालवीय, लक्ष्मी, और सुभाष बाबू का पथ देखा,

उस पर चलते अगणित मानव, भारत का भविष्य देखा,

लाडो सराय की गली देखी, और साकेत नगर का रूप दिखा,

गांव की रंगत भी देखा और नागर की संगत भी देखा,

टिक टुक मोबाइल पर लगी युवा, चलते फिरते यह सब देखा,

वाईफाई से हाईफाई लोगों को होते तब देखा,

इंडिया गेट अद्भुत ही लगा, आईएएस का द्वार दिखा,

सिटी बस से सफ़र में कई बला से नजरें चार दिखा,

भागा दौड़ी, लड़ते जाते, हर तरफ जीवन लाचार दिखा,

खुद की बेसुध में खोए जाते, जीना भी दुशुवार दिखा,

चौड़ी चौड़ी सड़कों पर भी, यातायात का जाम दिखा,

धमा चौकड़ी के मद में, जाम हिलाते युवा दिखा,

सेलेक्ट सिटी पर वॉक किए तो दुनिया का बाज़ार दिखा,

आंख सेकने पहुंच गई कुछ युवा तरुणाई भी देखा,

चांदनी चौक की गलियां देखी, पराठे वाले का दुकान दिखा,

ग्राहक प्रलोभन की माया में लोगों को जटता खेल दिखा,

जमा मस्जिद की सीढ़ी देखी पर प्रवेश मार्ग बाधित देखा,

रूढ़ीवाद से ग्रसित, परिधान सवालों में देखा,

मेट्रो के अंदर में मैंनें, एक अलग दुनिया देखा,

गुहावास पर भद्र गणों का रंग बिरंगी रूप दिखा,

डीयू की कॉलेज में जाकर आबोहवा में यूं देखा,

कि, शिक्षण काल में भी कुछ होनहार तो कुछ को सोते भी देखा,

कॉलेज की गलियारों से कुछ वाह! ठहाके होते देखा,

कैंटीन की गर्मी देखी, क्षुधा लबालब भरी दिखी,

जोड़ों में पूरी दिल्ली दिखी, कदम ताल लयमय देखा,

इस पार भी बहुत कुछ देखा, उस पार भी बहुत कुछ देखा,

जिस कारण से गए थे दिल्ली, वह जन्मदिवस की बेला देखा,

मस्तिष्क पटल पर हर याद समेटे, दृश्य बेहद, बेशक देखा,

दूरसंचार को दूर से जाते हुए तो नहीं देखा,

पर जाते जाते दिल्ली से यह दुखांत विदाई भी देखा,

वापस घर में जाकर मैनें स्मृतियों का गुलदस्ता देखा,

एक फोटो भेंट हुई थी जो, वह स्मृति शेष भी खुब दिखा...!


- विष्णुकांत चतुर्वेदी 

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