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अजीब सी हैं उलझने
अजीब सा समाधान है
जिस मंजिल को तलाशता है तू
क्यों राहें उससे अंजान है।

क़भी ढंग से तो कभी बेढंग ही
काटता तू चट्टान है
जिस मूरत को तराशता है तू
उस बुत में भी क्या जान है।

अकाल काल बनकर यूँ सबके
सिर पे विद्यमान है
दो रोटियों न होती हैं नसीब वो
कौन सा संविधान है।

जिस मंजिल को तलाशता है तू
क्यों राहें उससे अंजान है।

                      विशाल "बेफिक्र"

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