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जब जिम्मेदारियों का बोझ कांधे पर पड़ता है तब उंगलियां कलम पकड़ने से कतराती है, जेहन में भरे पड़े सारे जज्बात शब्द बनकर निकलना तो चाहते है परंतु अब ये संभव सा नही लगता । अब कलम की स्याही कविताएं नही लिखती, अब फोन में पड़े नोट्स सेक्शन में कोई जज्बात नही उमड़ती अब तो सिर्फ मेल चेक करने में दिन निकल जाता है और उंगलियां कलम पकड़े due sheets भर्ती रहती है । अब कहा कभी ज़बान कोई नगमा गाती है अब तो सुबह से शाम होती है बस yes sir, no sir, very well sir कहते कहते ....

Vishal ❣️

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