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Kumar VishwasPoetry1 min read

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में

Vishal SharmaVishal Sharma February 11, 2022
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जिंदगी की दौड़, धूप और छाँव में।

न जाने छाले कितने ही पड़े पाँव में।

शहर की ऊँची इमारतों के लगाव में।

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में।।


नये में ही शहर की सड़के भाँती हैं।

फिर याद गाँव की गली की आती हैं।

चमक-दमक विलासिता के बहाव में।

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में।।


महँगे होटल के खानों में वो बात नहीं।

कब से खाया खाना माँ के हाथ नहीं।

घर जाना न हो पाया वक्त के अभाव में।

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में।।


यार कहते है, जब से तू शहर गया।

भूल कर हमको तू कैसे ठहर गया।

आजा, फिर बैठेंगे बरगद की छाँव में।

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में।।


गाँव के एक कच्चे मकान की खिड़की से।

मुझे इश्क़ था, उससे झाँकती लड़की से।

कैसे जी होगी वो मासूम अलगाव में।

मैं चैन व सुकून छोड़ आया गाँव में।।

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