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Kumar VishwasPoetry1 min read

जब हाथ लगी किताबें

Vishal SharmaVishal Sharma March 12, 2022
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किताबों में जब मन लगने लगा।

पढ़ता रहूँ अजीवन लगने लगा।

जब पढ़ा तब जाना बोलती है ये।

सुकून का खजाना खोलती है ये।

प्यासा था, ढूँढता-फिरता था सैराब।

प्यास बुझ गई जब हाथ लगी किताब।



किताब इक पूरा इंसान होती है।

अपने लेखक की ये जान होती हैं।

किताब में वो लिख देता स्वयं को।

पढ़कर लगता, लिखी हो वयं को।

समेटे हुए होती है अंतर्विचारों के सैलाब।

प्यास बुझ गई जब हाथ लगी किताब।



फलक से तोड़ चाँद जेब में रख देती है।

सूरज को पकड़ लालटेन में रख देती है।

मन होता है जो भी कर देती है।

पानी के दीपक मे लौ भर देती है।

काली रातों में बन गई ये आफताब।

प्यास बुझ गई जब हाथ लगी किताब।


/ जानिब विशाल

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