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Kumar VishwasPoetry1 min read

इन स्याह काली रातों में

Vishal SharmaVishal Sharma November 3, 2021
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इन स्याह काली रातों में,

महबूब मेरे तुम कितना याद आयें।

मुझे सुलाने गाती थी जो, 

वो नज़्म तुम्हारी मुझे कौन सुनायें।।



सुबह होती थी तुमसे, शामें होती थी तुमसे।

मेरे सूने घर में सारी रौनके होती थी तुमसे ।

फिर रोशन कर दो घर, 

चली आओं तुम, गिले-शिकवे भूलायें।

मुझे सुलाने....



हर दिवाली साथ में हम जलाते थे फूलझड़िया।

देखो लाया हूँ इस बार भी पटाखों की लड़िया।

जला दो दीया फिर से, 

बैठी हो कब से दीप प्यार का बुझायें।

मुझे सुलाने.....


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