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ये रास्ता ये सफर

Vishal ShandilyaVishal Shandilya July 24, 2022
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न है आहट कोई

न निशान पत्थरों पर

अब ये बेजान शहर

कहाँ अच्छा लगता है।


चहकती कहाँ चिडिंयाँ

शजर भी है खाली

खामोशी भरा मंजर

कहाँ अच्छा लगता है।


दौरे उल्फत

वो दौर 

अब उसका दर

कहाँ अच्छा लगता है।


वो जो अच्छा लगता था

उसका वास्ता

अब उस कदर

कहाँ अच्छा लगता है।


चलते-चलते थक गया हूँ 

अब ये रास्ता

ये सफर

कहाँ अच्छा लगता है।


- विशाल

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