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प्रेम, बून्द का धरती का

Virender ld goutamVirender ld goutam October 7, 2021
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जब बारिश की बूंदें धरा पर गिरती है
या यूं कहें लिपटती है
हर बूंद गिरते गिरते ख़ुद को समेटते कुछ कहती जाती है
आपबीती बयाँ करती जाती है
जब वो तालाब ,सागर या कोई नदी का पानी थी
जब वो सूर्य की मार से अंदर तक टूटी थी
जिससे वो भाँप बनी थी
जब वो अपना मूल रूप त्याग
एक नई राह चली थी
और फिर  वो चली थी आसमां में बादलों के संग
उस सारे सफ़र का बयाँ
वो सब दुख दर्द समेटे रखती है
वापस धरा से मिलने तक
अपने प्रेम से बिछड़कर फिर से मिलने तक
फिर वो जिस तरह उस ज़मीन की रूह तक को चूमती है।
उस चूमने के साथ ही
धरा रो पड़ती है।
बूंद पर अलग होने के लिए बिफ़र पड़ती है
बिफ़रने के साथ निकलते है आँसू
और फिर निकलती है
उन्ही आँसुओ से महक
प्रेम की
इंतज़ार की
बिछड़कर फिर से मिलने की
उसी महक के इंतजार में है तुम, मैं, ये संसार और हमारा भगवान।

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