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ख्वाबों ने चिट्ठी लिखी है

Virag DhuliaVirag Dhulia December 9, 2021
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सुना है मेरे ख्वाबों ने 

मुझे एक चिट्ठी लिखी है 

भूले बिसरे मेरे ख्वाबों की 

कहीं तो एक गठरी रखी है 

ज़िन्दगी की नेमतों में 

ख्वाबों की गिनती नहीं हुई 

वक़्त की मुशक्कतों से 

इनकी तरफ से विनती नहीं हुई 

मायूसी और उदासीनता 

अब मेरे ख्वाबों की सखी है 

भूले बिसरे मेरे ख्वाबों की 

कहीं तो एक गठरी रखी है 


सुना है मेरे ख्वाबों ने 

मुझे एक चिट्ठी लिखी है 

दूर अंधियारे कोने में 

उम्मीद की एक किरण दिखी है 

कि सजग सजल हो 

आतुर बेकल हो 

ख़्वाब फिर से रंगीन हो 

आखिर कब तक हम गमगीन हों 

मेरे सफर के अंत में 

मेरे ख़्वाबों की महफ़िल जमी है 

भूले बिसरे मेरे ख्वाबों की 

कहीं तो एक गठरी रखी है 


सुना है मेरे ख्वाबों ने 

मुझे एक चिट्ठी लिखी है 

दिन के उजाले के पार 

डूबती रौशनी में जो संधि है 

उन बदलियों में छुपे ख़्वाब मेरे 

अब ना निकलते रात को माहताब मेरे 

ख़्वाबों को ज़िन्दगी बनाना कोशिश बन गई 

ज़िन्दगी एक अनदेखे ख़्वाब की कशिश बन गई 

एक आस आज भी अधूरी सी 

कोने में ज़ेहन के बसी है 

भूले बिसरे मेरे ख्वाबों की 

कहीं तो एक गठरी रखी है 

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