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अब सूख रही हैं टहनियाँ इश्क की मेरे

पतझड़ बनकर वो जीवन से जाने लगे हैं।

किसी और बाग की शायद शोभा बन रहे हैं

कल देखा तो खिले-खिले नजर आने लगे हैं।

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