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बहुत परवाह करती होगी वो मेरी 

बस मैं ही बेपरवाह हुआ जाता हूँ 


कभी तो दिमाग भी तकिया हिला देता उसके दिल का 

श्याद कभी इस शिद्दत से याद उसको मैं आता हूँ 


कुछ तो रही होगी उसकी मजबूरी उसकी बेवफाई की भी 

कुछ मेरा इश्क़ है की उसको याद करने को मजबूर हुआ जाता हूँ 


उसकी आखों से जब-जब देखी थी ज़िंदगी मैंने 

एक वजह जीने की मैं पाता था 


हिसाब शब्दों का अब रहा ही नहीं 

उसके साथ इतने बेहिसाब हो गए थे हम 

धड़कने अब भी याद करती है उसको 

वो धड़कन उसका नाम सुन कर अब रुक जाती है 


इश्क़ की सजा अगर ये ही सही 

सर तेरे नहीं - मेरे नहीं 

हमारे इश्क़ की इबादात मे 

आज 

अभी 

इस वक़्त 

भी झुखााता हूँ

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