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गुजर गए हैं ज़माने मगर,ताजा हैं वो यादें आज भी

शर्म कांधे पर लपेटे सबका बाथरूम में आना याद है


फ्रंट रोल की चोटें और घर की चिट्ठियों का मरहम

वो चोटें भूल गए मगर,वो चिट्ठियों का मरहम याद है


देर रात का वो फाल इन और परेड की पसीने की महक

थोड़ा टेढ़ा सा,मगर वो कड़क चक्रवर्ती  अभी तक याद है


ब्रेक में आलू के बौंडे,और थकी सी चाय की चुस्कियां

मुद्दतें गुजर गईं,मगर सत्या का हेयर कट याद है


अपने अपने दायरों की बंदिशों में हम कैद हैं जरूर

दिलों की गहराइयों में मगर वो ख्वाहिशें आजाद है


मिले हैं आज हम झूमती मुस्कुराती इस रात में

सर्दियों में गर्म लिहाफ सी दिलकश ये मुलाकात है


हमारी हसीन मुलाकातों का दौर यूं ही चलता रहे

कल भी हम साथ थे,कल के लिए भी साथ साथ हैं

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