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मकां का गुरुर...

vijay ranavijay rana October 25, 2021
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इतराता फिरता है मकां कितना गुरुर है खुद पर

कभी पलट कर पूछा नहीं किसी पत्थर का हाल


न कभी नींव से पूछा कैसे संभाला है भार इतना

न दीवारों से कभी पूछा कैसे हुई इतनी बदहाल


शहतीर जो मकां को कांधे पे उठा रखे है हर दम

कभी नजर झुका कर पूछा नहीं उससे भी सवाल


हर गारा हर पत्थर कुर्बां कर देता है वजूद अपना

रीढ़ की हड्डी सा लोहा भी,कभी करता नहीं मलाल


किसी की भी दगा मिटा सकती है मकां का वजूद

मगर ये कभी उठाते नहीं अपनी कुर्बानी का सवाल


किसीके वजूद के लिए मिटता है कितनों का वजूद

है कमाल मुकद्दर का,किसका काम,किसका जमाल


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