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मां की मर्म ममता ( कहानी )

Varun Singh GautamVarun Singh Gautam January 16, 2022
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रतनपुर नामक गांव में एक विधवा मां अपने बेटे के साथ घर में रहता था। बेटा अभी सात वर्ष का ही था, जिसका नाम सुशील था।

अपने बेटे को पढ़ाना मां को अत्यंत चिंता सता रही थी कि किस प्रकार से और कहां से अपने बेटे को पढ़ाएं, क्योंकि उनके पति के गुजर जाने के बाद घर का पुरा भार सुशील के मां के कंधों पर आ गयी था।

पहले सुशील की मां किसी तरह रुपयों का जुगाड़ करके सबसे पहले अपने बेटे का नाम स्थानीय विद्यालय में लिखवा दिया, जिससे कि उसके सुशील को उचित शिक्षा मिल सके।

अपने सुशील को नित्य-प्रतिदिन स्कूल छोड़ने और स्कूल से लाने भी जाती थी। जब स्कूल में फीस देने का समय आया। मां को अत्यंत चिंता हो रही थी कि अब स्कूल में किस प्रकार से फीस जमा करें।

अपने पड़ोसी के घर में गई लेकिन वहां उसे दुत्कार कर भगा दिया। कोई कर्जा देने को तैयार नहीं थे। सुशील के मां को इस बात की चिंता रहती थी कि फीस जमा नहीं होने के कारण सुशील को स्कूल से भगा ना दें।

दो-तीन दिन बाद सुशील की मां अपने बेटे के फीस जमा करने के लिए कई रईस के घर में बर्तन मांजना, खाना पकाना, कपड़ा धोना और कई प्रकार के बेगारी भी करती थी।

वहां से कुछ भी मिलता था, उसे अपने बेटे के फीस, स्कूल ड्रेस, किताब-कॉपी और भोजन पर खर्च करते थे।

कुछ रूपए जुगाड़ करके कुछेक महीनों के बाद स्कूल में फीस जमा करने के लिए गए स्कूल गए। फीस लेट जमा होने के कारण मां को शिक्षक के द्वारा ताने भी सुनने पड़े और उस पर शिक्षक ने और फाइन भी लगा दिए।

मां रोती-बिलखती शिक्षक के चरणों में गिरकर फाइन हटा देने के लिए रहम की भीख मांगने लगे। शुरुआत में शिक्षक अपने बात अड़े रहे लेकिन अंत में जाकर फीस में फाइन को हटा दिए।

रोती-बिलखती मां घर को आई और सोचने लगी कि मेरा बेटा कुछेक वर्ष में बड़ा आदमी बन जाएगा और मेरा दुख का साया खत्म हो जाएगा और कई सारी आशाएं अपने बेटे पर बैठा रखी थी। मां को ऐसा लग रहा था कि हमारा बेटा मेरा आंखों का तारा है, सबसे न्यारा और प्यारा है। एक दिन जरूर मेरे दुख का साया मिटा देगा इसी आशाओं को लेकर मां रोज सुशील को स्कूल पहुंचाने जाती और वहां से ले भी आती और तो और रईस के घर में ठांव-चोका करके फीस भी जमा करती थी।

इसी तरह दिन बीतते गए….।

एक दिन ऐसा आया उनका बेटा स्नातक पास करके एक सरकारी नौकरी लग गई। इसी बीच सुशील का शादी भी रईस घर के एक सुंदर लड़की से हो गई, जिसका नाम कंगन था।

मां प्रसन्नता में फूली नहीं समा रही थी, क्योंकि उनका प्रतीक्षारत सपना पूरा हो गया था। इसी दिन के लिए मां ने कितनो ही आंसू की बौछार बहाए होंगे, उनको ऐसा लग रहा था कि चलो अब हम लोगों का जिंदगी सुधर जाएगी।

इसी तरह हंसी खुशी में दिनोदिन बीतते गए। एक दिन ऐसा आया। सुशील का स्थानांतरण कहीं दूर प्रदेश के इलाका में हो गया। सुशील अपनी मां को घर पर छोड़कर प्रदेश रवाना को हुए। सुशील अपनी मां से यह वादा करके गए कि कुछेक दिन में मैं फिर लौट के आऊंगा और आपको भी वहां पर ले जाऊंगा और पहुंचते ही आपको एक कॉल भी करूंगा।

मां के चरण स्पर्श के बाद सुशील और उसकी पत्नी गाड़ी पर चढ़ गए….।

सुशील दूसरी प्रदेश जाने के बाद ना मैसेज और ना ही कॉल किया। सुशील के जाने के बाद उसकी मां का मन विचलित-सा था‌।

इनको यही बात की चिंता थी कैसे सुशील वहां पहुंचा होगा ?, कैसे यात्रा हुई होगी ?, यात्रा में कुछ दिक्कतें तो नहीं आई होगी ? आदि-आदि अनेक प्रश्न मां के हृदय से उठ रहे थे जो एक तरह से शूली की भांति चुभ रही थी। मां का ध्यान हमेशा ही फोन के कॉल और मैसेज पर था। उनकी प्रतीक्षा असार्थक हो रही थी, क्योंकि सुशील वहां पहुंचने के बाद कॉल भी नहीं किया और ना ही मैसेज।

समय बीतते गए लेकिन सुशील का कोई इंफॉर्मेशन नहीं आया। मां का हर हमेशा ध्यान सुशील के प्रति चिंता का कारक बन रही थी।

दिन बीत गए लेकिन सुशील का एक भी कॉल नहीं आया। मानो ऐसा लगता था कि सुशील अपनी मां का कृतज्ञता को भूल गया और कल की छोकरी के लिए अपनी मां को भूल गया।

जो उसे जन्म दी और कष्ट करके उसे पढ़ाया और लिखाया था। सब मां के लिए असार्थक सिद्ध हो रही थी है।

वहां सुशील अपने परिवार के साथ सेटलमेंट हो गया। हमेशा ही दुःख से असह्य प्रतीत हो रही थी। मां हमेशा ही इस इंतजार में रहते थे कि कब बेटा मेरा मुझे कॉल या मैसेज करेगा ?

लेकिन उसका बेटा तो अपने बाल-बच्चों और पत्नी के साथ खुशनुमा जीवन व्यतीत कर रहा था। सुशील को लगभग छह वर्षों के बाद मां के ख्याल आया और तत्परता से अपनी मां को कॉल लगाया लेकिन क्या ! कॉल तो कोई रिसीव कर ही नहीं रहा था।

कुछ समय बाद….

फोन के पास के ही एक व्यक्ति ने रिंग बजते हुए फोन को सुना। उसने फोन में बज रहे रिंग

की ओर भागते हुए घर के अंदर आया और कॉल को उठाया तो उसने पाया क्या ! कोई और नहीं उसका बेटा सुशील है।

सुशील ने अपने मां के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया आप कैसे कुपुत्र हैं, जो अपनी मां की बिलखती हुई चेहरे को भी देखने नहीं आए।

सुशील रोते हुए कहा कि बताइए मेरी मां अभी है कहां ?

व्यक्ति ने कहा कि दो दिन पहले ही आपकी मां बाजार की ओर गई थी और अभी तक नहीं लौटी है। आपकी मां आपके लिए इतना इंतजार किए और अभी उनके पास एक वक्त खाने की एक सूखी रोटी भी नहीं है। भीख मांग कर अपना जीवन यापन करती थी, कोई तो उसे एक वक्त की रोटी भी नहीं देता था और तुम्हारी मां को अछूता दृष्टिकोण से पड़ोसी अपने घर से डांट फटकार कर भगा भी दिया करता था। आप उस मां को भूल गए जो आपको ठांव-चोका करके आप को पढ़ाया और लिखाया।

“आपको तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।”

अंतिम में व्यक्ति दीनतापूर्वक सुशील से अनुरोध किया कि आप आए जल्दी से अपनी मां को खोजें और उनसे माफी मांगे। यह कहते हुए उन्होंने कॉल को रख दिया।

सुशील अपनी मां की याद में रोते बिलखते हुए पत्नी और अपने बाल-बच्चों के साथ अपने कार में बैठा और रतनपुर की ओर प्रस्थान करने लगे।

जब रतनपुर बाजार में अचानक ही सुशील की कार एक बूढ़ी माता से जा टकरा गई। बूढ़ी माता वहीं राम के प्यारे हो गए और उनकी आत्मा ईश्वर में अंतर्धान हो गए।

सुशील भौंचक्का से कार से उतरा बूढ़ी माता को देखा तो और कोई नहीं उसकी अपनी जन्मदाता मां थी।

घटनास्थल पर स्थानीय लोग दौड़ै और पूछने लगे यह कौन और इनका घर कहां है ? यह दृश्य देख कॉल सुशील अपनी इज्जत बचाने के लिए अपना गाड़ी छोड़कर अपने परिवार के साथ वहां से नौ दो ग्यारह को हो ही रहे थे। लोगों ने तुरंत ही उसे और उसके परिवार वाले को दबोचा और सुशील को पीटने लगे। वहीं पर फोन उठाने वाले व्यक्ति आए और सुशील को पहले लोगों से बचाए और ध्यान से देखने के बाद बोले यह माता कोई और नहीं मार खाने वाले के ही माताजी थे। सभी लोग हक्का-बक्का हो गए। सुशील को कुछ लोग तो ताने देने लगे और कुछ तो कटु वचन कहने लगे। सुशील अपने किए करनी पर शर्मशार और हताश होकर गिर पड़े। सुशील पछताने के सिवा कुछ बचा नहीं था।





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