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महोच्चार जाग्रत उर में

Varun Singh GautamVarun Singh Gautam January 17, 2022
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सान्ध्य बीती जैसे जीवन नूर की नैया

बहती रेत – सी पीछे छुटती छैया

तस्वीर बन रचती जैसी हो शशि राग

बन , मुरझा उठीं अब अनस्तित्व महफ़िल


महाकाल का वज्र छिपा यह उपवन है किसकी ?

मन्त्र – मुग्ध की ललकार नही , यह धार शिखर का तेज नहीं

बढ़ आँगन उस शिखर तक लौट रहें वो किस नभमण्डल ?

यह खग किस ओर असमंजस में चला किस प्रतीर ?


इन्द्र खड्ग कौन माँगती , अब श्री कृष्ण गोवर्धन नहीं ?

यह वारिद स्वयं विप्लव द्युति आनन किस आण्विक ?

चलती राह तिरछी किरणों से गिरती बहे ओ धराधर

जैसे मानो रसपान प्रकृति या रब का हुँकार भरें ।


यह महोच्चार जाग्रत उर में कहो उपवन किस ओर ?

लौट रहे प्रतिध्वनि क्रांति की , कौन है इसका स्वरसम्राट् !

किस क्षितिज , किस किरणों से वो देती हमें सन्देश ?

बैठ आँगन महाशून्य में , दिवस लौटती क्या पन्थ पखार ?


पथ – पथ बिखरा धूल सी , करवट लें , हुआ क्यों संहार ?

व्रज उच्चाहट कहाँ छिपा , है किसका यह हथियार ?

बीत गयी धारा सब , बैठ कौन ज्ञानी दे रहा प्रकाश ?

दिवस बीती जैसे हो सान्ध्य , पन्थी के गुम हो गयी राह

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