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कहर उठी उर में

Varun Singh GautamVarun Singh Gautam January 16, 2022
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इस मिट्टी में वों सुगन्ध कहाँ अब ?

जब राम कृष्ण बुद्ध की बेला थी

कहते वों देश काल के स्वयं प्राण

भारत माँ बिखर गई जैसी गंगा – सी धार


तृण तरुवर से कुसुम कली अस्पृश्य हुए

लौट आया नव्य गरल व्याल उपदंश के

मनु माना सुवर्ण हम , यथार्थ वों मूक , भृत्य के दीवाने !

आह भरी दीन लगे देखने , कैसे प्रभु भी बिक गए ?


खग की चाह क्यों नहीं मिलती उस रश्मि क्षितिज में ?

इस महाशून्य के किस कण में वों उर्ध्वंग तस्वीर

यह वसन भी नहीं किस पेट को बांधती क्लेश – सी

बढ़ चली ले दौड़ केतन विजय गूँज स्वर बिखरी कहाँ तृषित ?


महफिल के प्याला में बिकती रक्त की बोल बाजार !

नव्य कोमल तन की रौनक मिलती धुंधले वारिद के !

क्या इन्तकाल या रैन सदा दिवा दिवस दूर शून्य में ?

प्लावित लय निस्पन्दन लिप्त कहाँ किस रन्ध्र में ?


शशि भुजंग खल के प्रलय प्रचण्ड के दूकुल

यह गत किस लघु अंश ठठोलती क्यों मृत अन्त्य ?

दो टूक ठठरी अवशेष पड़ा वात वल भी चले किसओर

यह व्रण कहर उठी उर में शय्या भी कहाँ फूलों के शव के शब में ?

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