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बहुरि अकेला भव में

Varun Singh GautamVarun Singh Gautam January 16, 2022
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नव्य शैशव हुए कितने वीरान

प्लव – प्लव – प्लावित माया

अब इस पुलिन की क्या कसूर?

जग – जग हुँकार अब भी त्राण


कौन सुने इन दुर्दिन की व्यथाएँ?

कहर उठी उर में चुभती भी कोमल हृदय में

लहर दे मारती स्वप्न में विकलता भी क्रदन करती

बहुरि अकेला भव में, दे अन्तिम कौन सन्देश?

आशाएँ टूट पड़ी जैसे पतझड़ के तृण यहाँ


दे बोल उठते सब कैसे हो तू प्रिय/प्रियवर?

मै सहचर तेरा सदा अगर एक हाँक दे दे मूझे

सच बताऊँ एक बार तू खंगाल दे उस उर को

बात भी बदल जाएगी जो दिए वचन मुख को


मुख – मुख में छिपा अग्नि के ज्वाल अंगार

जो दे विष उगल, हो जाएगा जग हाहाकार

दर्प हनन शेष नहीं, दे रही किस करुण कहानी को?

मत पूछ दर्द – अग्नि हो जिसका, आँशू की गिरे बौछार घनघोर


दिव्य प्रज्वलित नहीं उठते उमंग में, जो दबे पाँव पसार

भरती एक बार जोश उत्साह, फिर मिटी, वहीं जगहार

फूल बरसे या चन्द्रहास, कौन कहे फिर कोमल या तेज धार

लौ दीपक में भी कहाँ वो ढ़ूढ़ती प्रज्वलित ज्वाल अंगार?


निःशेष नहीं बचा, कहाँ वो कण भी जिसे ढ़ूढ़ते पन्थ न जाएँ भूल?

कँटीली काँटो में भी कहाँ, देखे पुष्पित पुष्प खिले अब राहों में?

राही राहों में देखें उपदंश, भ्रष्ट, मिथ्या, दम्भ भरा संसार

कहाँ जाऊँ? इस भव छोड़ अंतर्मन के भग्नहृदय में घनघोर कहर प्रबल है।


~ वरुण सिंह गौतम



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