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सवर्ण आरक्षण का सच

Varun Chaudhary antrikshVarun Chaudhary antriksh November 15, 2022
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आरक्षण का दंश झेल रहे सवर्ण को अपनी तस्तरी में 10 प्रतिशत की बोटी क्या दिखी उसकी सारी छुआछूत छूमंतर हो गई। तस्तरी देख कर आठ लाख कमाने वाले गरीब सवर्ण के मुंह में पानी आ रहा है। वहीं उस्ताद की घाघ नजर गहराई नाप रही थी कि सवर्ण वोटों की तिजोरी कोई और न लूट ले। खैर मैं असल मुद्दे पर आता हूं। पचास प्रतिशत सीटों के दावेदार गरीब सवर्ण कल भी सवर्ण कहलायेंगे। जबकि सिर्फ चालीस प्रतिशत सीटों पर समेट दिये गये ओबीसी क्रीमीलेयर को पिछड़ा शब्द से संबोधित किया जायेगा। 

आइये एक नजर सांख्यिकी पर डालते हैं। देखते हैं कौनसे वर्ग को अधिकतम कितनी सीटें मिल सकती हैं। 
गरीब सवर्ण  40%+10% = 50% 
अमीर सवर्ण  40% 
क्रीमीलेयर ओबीसी  40% 
नॉन क्रीमीलेयर ओबीसी  40%+27% = 67% 
एससी एसटी  40%+22.5% = 62.5%  

यदि कोई बुद्धिजीवी इन आंकड़ों को पहली बार देख रहा है तो यह चोंकाने वाले भी हो सकते हैं। अमीर सवर्ण और क्रीमीलेयर ओबीसी दोनों ही अधिकतम 40% सीटों पर अपनी दावेदारी कर सकते हैं। जबकि गरीब सवर्ण के दायरे में 50% सीट शामिल हैं। गौरतलब है कि आय प्रतियोगी का पारिवारिक मुद्दा है जबकि जाति जनसंख्या के एक बड़े वर्ग से ताल्लुक रखती है। स्पष्ट है कि किसी परिवार की आय निश्चित धनराशि से अधिक होने पर उनकी जाति का नाम पिछड़ा वर्ग की सूची से हटाया नहीं जाएगा। इसके बावजूद ओबीसी क्रीमीलेयर गरीब सवर्ण से भी कम सीटों पर समेट दिया गया है। वाह जस्टिस! 

ऐसा लगता है शीर्ष संस्थाओं ने हालात के सामने पूरी तरह आत्म-समर्पण कर दिया है। जैसे वह खुलेआम कह रहे हैं कि हमारे पास जाति व्यवस्था का कोई उपाय नहीं है। बेहद चोंकाने वाला सच यह है कि सवर्ण अपनी तथाकथित सुप्रीमसी की वजह से एवं एससी एसटी वर्ग आरक्षण लाभ की वजह से इस व्यवस्था को समाप्त करना ही नहीं चाहते हैं। इस सबके बीच में ओबीसी क्रीमीलेयर बेवजह पीड़ित बन कर रह गया है। 

उपरोक्त मसले पर कुछ तीखी टिप्पणियां अभी बाकी हैं। आरक्षण वह गन्दा नाला है जिसमें डुबकी लगाने वाला भले ही गंगाजल से स्नान कर ले वह अपवित्र ही कहलायेगा। शेर यदि मरे हुए जानवरों का मांस खाना शुरू कर दे तो उसे जंगल का राजा नहीं कहा जा सकता। इस नए तरीके के शेर को सियार किंग कहना ज़्यादा उचित रहेगा। भीख लेने वाला जीवन में कितना भी दान कर ले वह भीख देने वाले के सामने कभी दानी नहीं कहलाएगा। 

आरक्षण यदि गलत है तो फिर आरक्षण का कोई भी आधार निराधार है। यह दस प्रतिशत वाली तस्तरी सवर्णों की लाचारी और मौक़ापरस्ती की कहानी भविष्य में भी दोहराती रहेगी। 

© वरुण चौधरी अंतरिक्ष  

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