दिव्यदृष्टि's image
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निगाहों के चित्रपटल पर 
सभी दृश्य गुमसुम हैं। 
मेरे चराग़ मद्दिम हैं मगर 
खयाल खूब रोशन हैं। 

अंधकार में देखता हूं 
अतीत की स्मृतियां। 
ख़यालों में निहारता हूं 
मौसम की झलकियां। 

ढ़लती शाम की तरह 
हर सुबह गुजर जाती है। 
निगाह वालों को यह 
बेबसी कहां नजर आती है। 

कभी अंतर्मन तैरता है 
चैतन्य की लहरों पर। 
फिर शून्य में प्रकाशपुंज 
आता है नज़र। 

धुंधली सी हकीकत 
और साफ हो जाती है। 
वह दिव्यदृष्टि मुझे 
उनसे ज़्यादा दिखाती है। 

जो  आंखें 
होकर  भी 
चकाचौंध  के सिवा 
कुछ  भी 
देख नहीं पाते।

© वरुण चौधरी अंतरिक्ष 

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