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"उड़ चल परिंदे दूर कहीं"

Varsha SaxenaVarsha Saxena October 20, 2021
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कफ़न से लिपटा हुआ है जो, वही तेरा वेश यहाँ,
उड़ चल परिंदे दूर कहीं, तेरा ना कोई देश यहाँ।

ये जीत हार की दुनिया है, तू शतरंज का सिपाही है,
अदाकारों की बस्ती है, और ये मंच तेरा इलाही है,
मिले सुकूँ इन साँसों को, ऐसा हो परवेश जहाँ,
उड़ चल परिंदे दूर कहीं, तेरा ना कोई देश यहाँ।

ये नदियाँ अब जल लेती हैं, शज़र धूप दिखाते हैं,
ये ख्वाब आँखों में आकर, तुझको देख रुलाते हैं,
बुला रहीं तुझको राहें, नहीं कोई उपदेश वहाँ,
उड़ चल परिंदे दूर कहीं, तेरा ना कोई देश यहाँ।

पग पग पर देख यहाँ, तेरा अपना ही छले तुझे,
फिर क्यों ना इस भीड़ से, तन्हाई भली लगे तुझे,
ढूँढ ऐसे आँगन को, पूरा हो तेरा उद्देश्य जहाँ,
उड़ चल परिंदे दूर कहीं, तेरा ना कोई देश यहाँ।

-वर्षा सक्सेना

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