नेह के नाते's image
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मुझसे तुमने नेह के नाते
तोड़ दिए क्यों ठाकुर जी

जबसे तुमने गोकुल छोड़ा
मथुरा में तुम जाए बसे
तबसे सूखी मेरी काया 
जनमानस भी मुझपे हँसे
आने की थी आश बँधाई
कब आओगे ठाकुर जी

मुझसे तुमने नेह के नाते
तोड़ दिए क्यों ठाकुर जी

लगन लगी है एक तुम्हारी
घर आँगन कुछ सूझे न
पूछ रही हूँ कितने सवाल
कोई पहेली बूझे न
आकर फिर से हाथ थाम लो
अपनाओ फिर ठाकुर जी

मुझसे तुमने नेह के नाते
तोड़ दिए क्यों ठाकुर जी

तुम् बिन मटकी फोड़े कौन
नाजुक बैंया मरोड़े कौन
जमुना के तट सूने सूने
कैसी अगन लगाई तूने
राधा रानी तरस रही है
भ्रम तो मिटाओ ठाकुर जी

मुझसे तुमने नेह के नाते
तोड़ दिए क्यों ठाकुर जी।।
(स्वरचित, मौलिक-वर्षा अग्निहोत्री)

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