बस्ता's image
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ले कर निकले 
बस्ता किताबों का
जिम्मेदारियों की बोझ ने
कमर पकड़ ली

रास्ते ले कर चलें थे
बिना किसी पते के 
अब मंजिल की फिक्र
रात की नींद ले गई

आंख पर पट्टी बांध
भागना पड़ रहा 
सब के साथ
की कहीं सबको तो नही पता
वो पता जो हमें नहीं पता 

भीड़ हज़ार की
खींचे पांव सौ
हाथ बढ़ाओ की कोई साथ में
है बंधी पट्टी सबकी आंखों में

लड़ो दौड़ो भागो
गिरो तो फिर खड्डे हो जाओ
कहीं छुट गए पीछे 
तो सब तेज़ी से बढ़ गए 

क्या दुविधा है यह अजीब 
हम तो निकले थे 
सफ़र पे ख्वाबों का बस्ता लिए
ये जिम्मेदारियों ने फिर 
पर काट दिए ।।

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