एक शहर's image
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आज बहुत दिनों बाद अपने शहर वापस आया, 

अपने पुराने शहर को पूरी तरह परिवर्तित मैंने पाया।


स्टेशन से आते आते लगा के शहर कितना बदल गया है,

लगे देखने में ऊचा पर असल में नीचे फिसल गया है।


आकांक्षाओं को पूरा करने की होड़ में हम कितना आगे निकाल गए,

छोटे छोटे घर यू बड़ी बड़ी इमारतों में बदल गए।


आज के बच्चे हमारी तरह सड़कों पर नहीं खेलते है,

पढ़ाई का बोझ तो मात्र एक बहाना है दिन रात मोबाइल पर उंगलियां फेरते है।


सड़कें चौड़ी हो गई, बिजली अब २४ घंटे आती है,

घंटेघर की घड़ी भी अब पल-पल सच झूठ का हिसाब लगती है।


मंदिर के पुजारी का चरित्र भी बदला, बदला इमाम का भी इमान है,

इस नए शहर मै हर छण बिक रहा इंसान है।


शहर की हवा में अब कारखाने के धुएं की मिलावट है,

अंदर से खोखला हो गया सब ऊपर की सजावट है।


सब कुछ लगे है आडंबर का खेल,

आदमी आदमी से बात करता नहीं, भूले ये आपस का मेल।


ये शहेर अब नए आगोस में ढल चुका है जहां से ये वापिस पीछे नहीं जाएगा,

और मेरा बचपन, मेरा बचपन शायद कभी लौट कर नहीं आएगा।।

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