विजयनाद's image
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खण्डित मन के युग्मों को त्यागकर,

मन की अभिलाषाओं से कर दे नया शंखनाद

कर्म की उज्ज्वल-गाथा सुनाने के बाद,

कर आचमन अपने विजय-पथ का,मृदंग-मंजीरे बजाकर।


उकेर दे मन की आभाएँ सारी,

नवनिर्माण के इस सुंदर पटल पर।

सजा दे मन के हर कोने में तीव्र ज्योत्स्ना की चिंगारी,

मांगकर परमात्मा से महाशील पथ का अटल वर।


लक्ष्य की छाया में,कुंठाओं को करा अब विश्राम।

संकल्प,सिद्धि और संस्कार की त्रिवेणी की बनकर धारा,

परिश्रम और धैर्य के तरुवर की शाखाओं का लेकर सहारा,

साफल्य को अंत्योदय बना,गढ़ नया अब आयाम।


नवप्रभात की लालिमा समेत,मिटा सारे लुप्त विकार।

चीर दे उन बुझे हुए खंडहरों को,दिखा उनको विजय-लहर।

जो रहते हैं उन जंगलों में जहाँ रहता है तम आठों पहर,

उन्हें भी इस अखिल विश्व के अजेय-यज्ञ में,दिखा ख़ुशी का आकार।


लक्ष्य को भेदकर,दुर्बलताओं के संशय का कर शिकार।

माँग इस चेतक की अनुपम धरा से,विजय का नया आशीर्वाद।

ज्ञान को संबल बना,कर विश्व को निर्विवाद।

दिव्याभा की इस अनमोल वसुधा पर कर नूतन विजय स्वीकार।

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